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सम्‍मेलन में पेश हुआ ‘सच के साथी’ अभियान के प्रभाव पर रिसर्च पेपर, ट्रेनिंग के बाद फेक इमेज पहचानने वालों की संख्या बढ़ी

नई दिल्‍ली। जागरण न्‍यू मीडिया के ‘एआई के नैतिक उपयोग और साक्षरता’ सम्‍मेलन में शारदा यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मुक्ता मार्टोलिया ने ‘सच के साथी’ अभियान के प्रभाव पर एक रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि डिजिटलीकरण के इस दौर में वरिष्ठ नागरिक सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। उन्होंने इस अध्ययन के जरिए वरिष्ठ नागरिकों के नजरिए को समझने की कोशिश की थी।  

उन्होंने कहा, ”इस स्टडी में डिजिटल मीडिया लिटरेसी, जानकारी की पड़ताल के तरीके और वरिष्ठ नागरिकों के लिए गलत सूचनाओं से सामना करने का तरीका हमने जाना। इस कारण हमने ‘सच के साथी’ अभियान के असर को जानने की कोशिश की। इसके तहत हमने जानना चाहा कि ऐसे क्या तरीके हैं, जिनके जरिए वरिष्ठ नागरिक मिस-इन्फॉर्मेशन को पहचान पाएं और उनका सामना कर पाएं। कई स्टडीज ने हमें यह बताया कि 92 फीसदी वरिष्ठ नागरिक स्मार्टफोन का प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन इस नंबर को काउंटर करते हुए दो फैक्ट्स सामने आए। इनमें से केवल 38% फिशिंग स्कैम को पहचान सकते हैं, जबकि केवल 32% सीनियर सिटिजन्‍स ‘टू स्टेप वेरिफिकेशन’ प्रक्रिया को समझ सकते हैं।” 

स्टडी के बारे में बताते हुए डॉ. मुक्ता ने कहा, ”वरिष्ठ नागरिकों की ट्रेनिंग के लिए कई भाषाओं में वर्कशॉप का आयोजन किया गया। पहले चरण में 12.7 मिलियन (1.27 करोड़) प्रतिभागी इस अभियान का हिस्सा बने, जबकि दूसरे चरण में 11.16 मिलियन (1.16 करोड़) लोग प्रतिभागी बने। उन्होंने बताया, ”स्टडी में शामिल वरिष्ठ नागरिकों ने स्वीकार किया है कि वे अपने सोशल नेटवर्क में अब प्रमाणित सूचना शेयर करते हैं और लोगों को इसमें मदद भी करते हैं।”  

डॉ. मुक्ता ने कहा, ”इस अभियान का सबसे अच्छा पार्ट है कि यह वरिष्ठ नागरिकों को सिखाकर उनको ‘सच के साथी’ बना रहा है, जिसके बाद सीनियर लोग कम्युनिटी रेजिलियंस बनाने के लिए वकालत कर सकते हैं। स्कैम डिटेक्शन के बारे में बात करें तो सिर्फ 41% ऐसे यूजर्स थे, जो स्कैम पहचानने के तरीकों के बारे में जानते थे, लेकिन ट्रेनिंग के बाद में यह नंबर बढ़कर 97% तक पहुंच गया। ट्रेनिंग से पहले केवल 22% लोग फेक वीडियो या तस्वीर को पहचानने की क्षमता रखते थे, लेकिन ट्रेनिंग के बाद यह संख्या 78% हो गई।” 

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