Fact Check: शंकराचार्य पर लाठीचार्ज का वीडियो 2015 का, भ्रामक दावे के साथ किया जा रहा वायरल
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर लाठीचार्ज के वीडियो को लेकर किया जा रहा दावा भ्रामक है। असल में वायरल वीडियो साल 2015 में हुई घटना का है।
- By: Pragya Shukla
- Published: Feb 12, 2025 at 11:26 AM
- Updated: Feb 12, 2025 at 11:33 AM
नई दिल्ली (विश्वास न्यूज)। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर लाठीचार्ज करते हुए कुछ पुलिसकर्मियों का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो को हाल ही में हुई घटना का बताते हुए योगी सरकार की आलोचना कसते हुए शेयर किया जा रहा है।
विश्वास न्यूज ने अपनी पड़ताल में पाया कि वायरल दावा भ्रामक है। असल में वायरल वीडियो साल 2015 में हुई घटना का है। दरअसल, 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंगा में मूर्तियों के विसर्जन पर रोक लगा दी थी। संतों ने इस फैसले के खिलाफ वाराणसी में प्रदर्शन किया था। इसी धरने को हटाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसमें अविमुक्तेश्वरानंद भी शामिल थे। बताते चलें कि उस वक्त प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी (सपा) की सरकार थी और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे।
क्या हो रहा है वायरल ?
फेसबुक यूजर ‘आरिफ समाजवादी’ ने 10 फरवरी 2025 को वायरल वीडियो को शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा है, “अमृतकाल में सनातन का प्रचार शंकराचार्य पर लट्ठ का प्रहार (लाठीचार्ज )कहाँ हैं हिन्दू रक्षा के नाम पर खून खराबा करने वाले।”
पोस्ट के आर्काइव लिंक को यहां पर देखें।

पड़ताल
वायरल वीडियो की सच्चाई जानने के लिए हमने वीडियो के कई कीफ्रेम निकाले और उन्हें गूगल रिवर्स इमेज की मदद से सर्च किया। हमें वीडियो का ऑरिजिनल वर्जन आज तक के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर मिला, जिसे 24 सितंबर 2015 को अपलोड किया गया था। दी गई जानकारी के मुताबिक, वाराणसी में गणेश विसर्जन को लेकर बवाल हुआ था। इसके बाद मामले को काबू में लाने के लिए पुलिस ने लोगों पर लाठीचार्ज किया था।
प्राप्त जानकारी के आधार पर हमने गूगल पर संबंधित कीवर्ड्स की मदद से सर्च किया। हमें दावे से जुड़ी एक न्यूज रिपोर्ट न्यूज 18 की आधिकारिक वेबसाइट पर मिली।
23 सितंबर 2015 को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक,, “इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंगा में मूर्तियों के विसर्जन पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने रोक लगाने के साथ ही यह भी आदेश दिया था कि सरकार मूर्तियों के विसर्जन की वैकल्पिक व्यवस्था करें। इसी को लेकर कई समूह धरना-प्रदर्शन करने लगे थे। इसी प्रदर्शन में अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती भी शामिल थे। इस धरने पर बैठे लोगों को हटाने के लिए और मामले को काबू करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया था।”

अन्य न्यूज रिपोर्ट को यहां पर देखा जा सकता है।
भास्कर.कॉम पर 25 सितंबर 2015 को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, “इस लाठीचार्ज को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रमुख सचिव नगर विकास, डीएम और एसएसपी वाराणसी को नोटिस जारी की थी। कोर्ट ने इन अफसरों को नोटिस जारी कर संतों पर किए गए बर्बर लाठीचार्ज के संबंध में स्पष्टीकरण मांगा था।”
रिपब्लिक भारत के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर 13 अप्रैल 2021 को अपलोड वीडियो रिपोर्ट के मुताबिक, लाठीचार्ज वाले मामले के दौरान प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार थी और उन्होंने इस घटना के लिए माफी मांगी थी।
अन्य न्यूज रिपोर्ट को यहां पर देखा जा सकता है।
गौरतलब है कि उस दौरान उत्तराखंड के ज्योर्तिमठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती थे और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद उनके शिष्य थे। स्वरूपानंद सरस्वती के बाद अब अविमुक्तेश्वरानंद, उत्तराखंड के ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य हैं।
अधिक जानकारी के लिए हमने दैनिक जागरण के वाराणसी के संपादकीय प्रभारी बसंत कुमार से संपर्क किया। उन्होंने हमें बताया कि वायरल दावा करीब दस साल पहले हुए एक प्रदर्शन का है।
अंत में हमने वीडियो को भ्रामक दावे के साथ वायरल करने वाले यूजर के अकाउंट को स्कैन किया। हमने पाया कि यूजर एक विचारधारा से जुड़ी पोस्ट को शेयर करता है।
निष्कर्ष: विश्वास न्यूज ने अपनी पड़ताल में पाया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर लाठीचार्ज के वीडियो को लेकर किया जा रहा दावा भ्रामक है। असल में वायरल वीडियो साल 2015 में हुई घटना का है, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के गंगा में मूर्तियों के विसर्जन पर रोक के फैसले के खिलाफ संतों ने वाराणसी में धरना प्रदर्शन किया था। इस धरने को हटाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया। उस दौरान प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की नहीं, बल्कि अखिलेश यादव की सरकार थी।
- Claim Review : महाकुंभ में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर हुई लाठीचार्ज का वीडियो।
- Claimed By : FB User आरिफ समाजवादी
- Fact Check : भ्रामक
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