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Fact Check: SC ने सभी हिंदू महिला और मुस्लिम पुरुष की सभी शादियों को नहीं बताया अवैध, पुराना फैसला भ्रामक दावे से वायरल

नई दिल्ली (विश्वास न्यूज)। सोशल मीडिया यूजर हिंदी अखबार में छपी एक खबर का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए दावा कर रहे हैं सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू समुदाय को राहत देते हुए एक बड़ा फैसला दिया है और इसके मुताबिक, अब से हिंदू महिला और मुस्लिम पुरुष की सभी शादी अवैध मानी जाएगी।

विश्वास न्यूज ने अपनी जांच में इस दावे को भ्रामक पाया। वायरल पोस्ट में जिक्र की गई खबर सही और पुरानी है। लेकिन यह एक मामले में दिया गया निर्णय था, जिसका प्रभाव केवल इसी मामले तक सीमित था। संपत्ति विवाद के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देते हुए स्पष्ट किया था कि हिंदू महिला की मुस्लिम पुरुष से शादी वैध नहीं है लेकिन जन्म लेने वाली संतान जायज है और उसे अपने पिता की संपत्ति में हक पाने का अधिकार है।

क्या है वायरल?

विश्वास न्यूज के टिपलाइन नंबर पर कई यूजर्स ने इस स्क्रीनशॉट को भेजकर उसकी सच्चाई बताने का अनुरोध किया है।

विश्वास न्यूज के टिपलाइन पर भेजा गया क्लेम।

पड़ताल

वायरल पोस्ट के आधार पर की-वर्ड सर्च करने पर हमें इससे संबंधित कई पुरानी रिपोर्ट्स मिली, जिसमें इस घटना का जिक्र है। न्यूज एजेंसी पीटीआई के हवाले से लिखी खबर के मुताबिक, “सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू महिला की मुस्लिम पुरुष से शादी और उसके बाद जन्मी संतान के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है। SC ने कहा है कि एक हिंदू महिला की मुस्लिम पुरुष से शादी ‘नियमित या वैध’ नहीं है लेकिन इस तरह के वैवाहिक संबंधों से जन्म लेने वाली संतान जायज है। मंगलवार को कोर्ट ने कहा कि ऐसी शादी से जन्मी संतान उसी तरह से जायज है जैसे वैध विवाह के मामले में होता है और वह (संतान) अपने पिता की संपत्ति में हकदार भी है।”

रिपोर्ट के मुताबिक, “इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने (केरल) हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि चूंकि हिंदू मूर्ति पूजक होते हैं इसलिए साफ है कि किसी हिंदू महिला का एक मुस्लिम पुरुष के साथ विवाह अनियमित है। संपत्ति को लेकर दायर किए गए मामले में इलियास और वल्लीअम्मा के बेटे शमसुद्दीन ने अपने पिता की मौत के बाद पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी का दावा किया था।”

22 जनवरी 2019 की टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में भी इसका जिक्र है। यह रिपोर्ट भी पीटीआई  के हवाले से प्रकाशित है।

रिपोर्ट के मुताबिक, अनियमित शादी का कानूनी प्रभाव यह है कि पत्नी मेहर की तो हकदार होती है, लेकिन वह पति की संपत्ति की हकदार नहीं होती है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की शादी से पैदा हुआ बच्चा अन्य वैध शादियों की तरह पिता की संपत्ति का हकदार होता है।

हमें इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भी मिला, जिसमें कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं है कि सभी हिंदू महिलाओं और मुस्लिम पुरुषों के बीच का विवाह अवैध होगा।

गौरतलब है कि विशेष विवाह अधिनियम, 1954 या स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत अंतर धार्मिक शादियां वैध होती हैं। इस कानून के सेक्शन 4 के मुताबिक, कोई भी दो व्यक्ति इस अधिनियम के तहत विवाह कर सकते हैं, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, बशर्ते वे उम्र, मानसिक क्षमता समेत अन्य संबंधित कानूनी शर्तों को पूरा करते हों।

Source-https://www.indiacode.nic.in/

इस कानून के तहत, विभिन्न धार्मिक समूह (हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, आदि) के लोग या यहां तक कि जो लोग किसी भी धर्म का पालन नहीं करते हैं, वे अपना धर्म बदले बिना विवाह कर सकते हैं।

संबंधित मामले को लेकर हमने सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ऑन-रिकॉर्ड अश्विनी दुबे से संपर्क किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक केस से जुड़ा हुआ था न कि यह ब्लैंकेट जजमेंट था। उन्होंने बताया विशेष विवाह अधिनियम, 1954, समान या विभिन्न धर्मों के व्यक्तियों को आपस में शादी करने की अनुमति देता है।

निष्कर्ष:हिंदू महिला और मुस्लिम पुरुष की शादी के अवैध होने के दावे से वायरल हो रही खबर का स्क्रीनशॉट 2019 के एक पुराने मामले से संबंधित है, जिसमें संपत्ति विवाद के मामले में केरल हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने साफ कहा था हिंदू महिला की मुस्लिम पुरुष से शादी वैध नहीं है, लेकिन उससे पैदा हुई संतान जायज है और उसे पिता की संपत्ति में हक पाने का अधिकार है।

  • Claim Review : सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू महिला और मुस्लिम पुरुषों की शादियों को अवैध घोषित किया।
  • Claimed By : Tipline User
  • Fact Check : भ्रामक

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