Fact Check: सच्चर समिति ने नहीं की मुस्लिमों के दोगुने मताधिकार और विधायिका में सीटों को आरक्षित किए जाने की सिफारिश
मुस्लिमों के लिए संसद और विधानसभा में सीटों की संख्या आरक्षित करने और उनके एक मत को दो के बराबर गिने जाने का दावा फेक है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार में (2005 में) गठित सच्चर समिति ने अपनी रिपोर्ट में ऐसी कोई सिफारिश नहीं की थी। साथ ही वायरल पोस्ट में इस समिति की रिपोर्ट के हवाले से शेयर किया जा रहा अन्य दावा भी भ्रामक और निराधार है, जिसमें तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है।
- By: Abhishek Parashar
- Published: Dec 4, 2025 at 05:17 PM
- Updated: Dec 4, 2025 at 05:27 PM
नई दिल्ली (विश्वास न्यूज)। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से वक्फ रजिस्ट्रेशन की डेडलाइन बढ़ाए जाने की याचिका पर कोई राहत नहीं मिलने के बाद सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर एक पोस्ट को वायरल कर दावा किया जा रहा है कि सच्चर कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में यह सिफारिश की थी कि मतदान के दौरान मुस्लिमों के एक वोट को दो वोट के बराबर मानते हुए भारत में 30% संसद की सीट और हर एक राज्य में 40% विधानसभा की सीटों को मुस्लिमों के लिए रिजर्व किया जाए। इन दोनों दावों के अलावा पोस्ट में कुल ऐसे ही 10 अन्य दावे किए गए हैं।
विश्वास न्यूज ने अपनी जांच में इनमें से अधिकांश दावे को फेक और तथ्यों से परे पाया। सच्चर समिति ने शैक्षिक सुधारों और वित्तीय समावेशन की कोशिशों के जरिए मुस्लिमों की स्थिति को बेहतर किए जाने का सुझाव दिया था लेकिन समिति ने अपनी सिफारिश में मुस्लिमों के एक वोट को दो के बराबर गिने जाने और संसद व विधानसभा में क्रमश: 30 और 40 फीसदी सीटों को मुस्लिमों के लिए आरक्षित किए जाने जैसी कोई सिफारिश नहीं की थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में मुस्लिमों के बेहतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए परिसीमन में भी सुधार किए जाने की सिफारिश की थी।
क्या है वायरल?
विश्वास न्यूज के टिपलाइन नंबर +91 9599299372 पर कई यूजर्स ने इस पोस्ट को शेयर किया है, जिसमें लिखा गया है, “मुसलमान 1 वोट डालेगा तो उसकी* *गिनती 2 वोट के बराबर होगा**सच्चर कमिशन की मांग थी ऐसी* *सच्चर कमिशन क्या था ?जिसे सोनिया गांधी मनमोहन की सरकार मे 2005 मे लाई थी? ÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷= *”सच्चर कमिशन” नाम का आयोग सोनिया गांधी के कहने पर बनाया गया था जिसका काम था भारत मे मुसलमानो की आर्थिक स्थिति का आंकलन करने के लिए* ⚠️ *साफ शब्दों मे कहा जाय तो भारत के अस्तित्व को तालिबानी बनाने के लिए कांग्रेस ने बनाया था “सच्चर कमीसन ” 2005 मे* ⚠️ *”सच्चर कमिसीन” ने मनगढंत रिपोर्ट सोनिया गांधी के इसारे पर बना के देश को ये झूठ परोस दिया की भारत मे मुसलमानो की स्थिति दलितों और आदिवासियो से भी बदत्तर है* ⚠️ *अब “सच्चर कमिशन” ने मुसलमानो की स्थिति सुधारने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 10 तरीके का सुझाव दिया और इसे जल्द से जल्द भारत मे लागु करने की मांग किया* =÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷= *वो 10 बड़ी मांग इस प्रकार से थी* =÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷= *1) मुसलमानो को भारत मे आबादी के हिसाब से दोगुना अधिकार मिले अर्थात अगर मुसलमान 1 वोट डाले तो उसकी गिनती 2 वोट के बराबर हो* *2) मुसलमानो को OBC आरक्षण के साथ-साथ SC-ST के हिस्से वाले आरक्षण मे भी पुरा-पुरा लाभ मिले* *3) मुसलमान अगर किसी भी बैंक से लोन ले तो उसका आधा लोन केंद्र और राज्य सरकार मिल के भरे* *और भारत के कुल बजट का 20% हिस्सा मुसलमानो के लिए निकाल कर बाकी बचे बजट से पूरे देश को चलाया जाय* *4) IIT-IIM और MBBS समेत् सभी तरह के ग्रेजुएशन, की पढ़ाई के लिए मुसलमानो को अल्पसंख्यक-मंत्रालय के अंतर्गत मुफ्त पढ़ाई कराई जाय* *5) भारत का शिक्षा मंत्रालय मुसलमानो के मदरसा की डिग्री को IAS- IPS-PCS और जज़ बनने के लिए भी मान्यता दे* *6) भारत मे 30% सांसदों की सीट और हर एक राज्य मे 40% विधायकों की सीट मुसलमानो के लिए रिजर्व किया जाय* *7) भारत की हर एक राज्य सरकार बोर्ड निगम और सरकारी नौकरियो मे मुसलमानो की हिस्सेदारी बढ़ा के 50% करे* *8) मुसलमानो को व्यापार करने के लिए हर एक राज्य मे अगल-अलग इंड्रस्ट्रियल जोन हो और उसे वहा कर्ज मुक्त लोन के साथ मुफ्त बिजली और मुफ्त ज़मीन मिले* *9) मुस्लिम लड़कियों की शादी के लिए केंद्र सरकार 5 लाख रुपये और राज्य सरकार 2 लाख रुपये की मदद करे और मुस्लिम लड़को के स्व रोजगार के लिए 10 लाख रुपये सरकार अनुदान करे* *10) जिस भी गाँव क़स्बा शहर या जिला मे मुस्लिम आबादी 25% से ज्यादा हो उसे सिर्फ मुसलमानो के चुनाव लड़ने के लिए रिजर्व कर दिया जाय* *सारी जानकारी आप को आसानी से Google और Youtube पर मिल जाएंगी “सच्चर कमिशन” के बारे मे* *BJP के कड़े विरोध के बाद कांग्रेस ने “सच्चर कमिशन” को लागु नही कर सकी* *वरना हिन्दुओ के 1 वोट के सामने मुसलमानो का 2 वोट की गिनती भारी पड़ता और भारत की राजनीति और पूरे देश का संसाधन मुसलमानो के कब्जे मे चला गया होता* *खुद भी इस पोस्ट को 10 बार पढ़े और*100 करोड़ हिन्दुओ तक इस पोस्ट को शेयर कर के पहुँचाये*

सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर कई अन्य यूजर्स (आर्काइव लिंक) ने इस पोस्ट को समान और मिलते-जुलते दावे के साथ शेयर किया है।
पड़ताल
इस पोस्ट में कुल 10 दावे किए गए हैं और इसमें पहला दावा यह है कि सच्चर समिति ने अपनी सिफारिश में कहा था कि देश में “मुसलमानों को भारत में आबादी के हिसाब से दोगुना अधिकार मिले अर्थात अगर मुसलमान एक वोट डाले, तो उसकी गिनती 2 वोट के बराबर हो।”
पहला दावा: “मुसलमानों को भारत में आबादी के हिसाब से दोगुना अधिकार मिले अर्थात अगर मुसलमान एक वोट डाले, तो उसकी गिनती 2 वोट के बराबर हो।”
भारत सरकार की अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की वेबसाइट पर सच्चर समिति की रिपोर्ट मौजूद है। इस समिति का गठन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के दौरान किया गया था, जिसने अपनी रिपोर्ट 2006 में सौंप दी थी। मुस्लिमों के मतदान को लेकर ऐसी कोई सिफारिश हमें इस रिपोर्ट में नहीं मिली, जिसमें यह कहा गया हो कि मुस्लिमों के एक वोट की गिनती दो के बराबर होगी। यानी यह दावा भी फेक है।
हालांकि, रिपोर्ट में मतदाता सूची में मुस्लिमों के शामिल नहीं होने का जिक्र जरूर है। रिपोर्ट में कहा गया है, “कई राज्यों में मतदाता सूची में मुस्लिमों के नाम शामिल नहीं हैं।”

गौरतलब है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 देश के नागरिकों को मत का अधिकार (एक व्यक्ति, एक वोट) देता है। पहले मतदान करने की उम्र 21 वर्ष थी, जिसे 1988 के 61वें संशोधन के बाद घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया।
दूसरा दावा: “मुस्लिमों को OBC आरक्षण के साथ-साथ SC-ST के हिस्से वाले आरक्षण में भी पूरा-पूरा लाभ मिले !”
यह दावा भी भ्रामक है। सच्चर समिति की रिपोर्ट में मुस्लिमों कोओबीसी आरक्षण के साथ एससी-एसटी के हिस्से का आरक्षण देने की बात नहीं की गई है। हालांकि, यह रिपोर्ट पिछड़े मुस्लिम समूहों को ओबीसी कैटेगरी में शामिल करने की वकालत करती है।
रिपोर्ट में कहा गया है, “कॉन्स्टिट्यूशनल (शेड्यूल्ड कास्ट) ऑर्डर, 1950, जिसे आम तौर पर प्रेसिडेंशियल ऑर्डर (1950) के नाम से जाना जाता है, एससी (अनुसूचित जाति) का स्टेटस सिर्फ उन हिंदू समूहों तक सीमित करता है जिनके काम ‘गंदे’ (अनक्लीन) हैं। इसलिए उनके गैर-हिंदू जैसे लोगों को मिडिल कास्ट के कन्वर्ट हुए लोगों के साथ रखा गया है और उन्हें ओबीसी घोषित कर दिया गया है। इस तरह, मुसलमानों में OBC दो बड़ी कैटेगरी में आते हैं। ‘अरजाल’ से जुड़े हलालखोर, हेलास, लालबेगी या भंगी (मैला ढोने वाले), धोबी (धोबी), नाई या हज्जाम (नाई), चिक्स (कसाई), फकीर (भिखारी) वगैरह इस्लाम में धर्मांतरित हुए ‘अछूत’ लोग हैं, जिन्हें ओबीसी लिस्ट में जगह मिली है। मोमिन या जुलाहा (बुनकर), दर्जी या इदिरी (दर्जी), रायीन या कुंजारा (सब्जी बेचने वाले) अजलाफ या ‘साफ’ काम करने वाली जातियों से आए लोग हैं। इस तरह, मुसलमानों में तीन ग्रुप देखे जा सकते हैं: (1) वे जो सामाजिक रूप से पिछड़े नहीं हैं, यानी अशराफ; (2) जो हिंदू OBC के बराबर हैं यानी अजलाफ और (3) जो हिंदू SC के बराबर हैं, अरजाल, जिन्हें मुस्लिम OBC कहा जाता है और जो (2) और (3) से मिलकर बने हैं।”

रिपोर्ट में केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों का जिक्र है, जहां आरक्षण का लाभ पूरी मुस्लिम आबादी को मिला हुआ है। साथ ही यह भी कहा गया है कि मुस्लिमों के भीतर ऐसे कई समूह हैं, जिन्हें केंद्रीय सूची में जगह मिली हुई है लेकिन उन्हें राज्यों की सूची में शामिल किया जाना बाकी है।
तीसरा दावा: “मुसलमान अगर किसी भी बैंक से लोन ले तो उसका आधा लोन, केंद्र और राज्य सरकार मिल के भरे, और भारत के कुल बजट का 20% हिस्सा मुसलमानों के लिए निकाल कर, बाकी बचे बजट से पूरे देश को चलाया जाए!”
मुस्लिमों के लोन का आधा हिस्सा केंद्र और राज्य सरकारों के चुकाए जाने और केंद्रीय बजट का 20 फीसदी हिस्सा मुस्लिमों के लिए विशेष रूप से आरक्षित किए जाने का दावा फेक है।
हालांकि, रिपोर्ट में यह कहा गया है कि मुस्लिमो की बैंक क्रेडिट या कर्ज तक पहुंच कम और अपर्याप्त है। रिपोर्ट में 2001 की जनगणना के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि जिन गांवों में मुस्लिम आबादी ज्यादा है, वहां बैकिंग सुविधाएं लेने वाले परिवारों का प्रतिशत काफी कम है। मुस्लिमों के वित्तीय पहुंच के दायरे से बाहर होने का असर उनके सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक तरक्की पर देखने को मिलता है। इसलिए उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए क्रेडिट तक उनकी पहुंच को मजबूत करना जरूरी है।

साथ ही “मुसलमानों को खास तौर पर सीधे क्रेडिट देने, अलग-अलग क्रेडिट स्कीम के बारे में जागरूकता पैदा करने और जानकारी देने में पारदर्शिता लाने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए।”
चौथा दावा: “IIT-IIM और MBBS समेत सभी तरह के ग्रैजुएशन की पढ़ाई के लिए, मुसलमानों को अल्पसंख्यक मंत्रालय के अंतर्गत मुफ्त पढ़ाई कराई जाए!”
यह दावा भी फेक है। सच्चर समिति की रिपोर्ट भारतीय मुस्लिमों के समावेशी विकास और उन्हें मुख्य धारा पर लाने पर जोर देती है, जिसमें मदरसा शिक्षा का एकीकरण (उन्हें हायर सेकेंडरी स्कूल बोर्ड से जोड़ने), मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में कौशल विकास के लिए आईटीआई और पॉलिटेक्निक संस्थान खोले जाने, छात्रों को छात्रवृत्ति और अन्य वित्तीय सहायता मुहैया कराने के साथ मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में उच्च गुणवत्ता वाले सरकारी स्कूलों को स्थापित किए जाने की सिफारिश की गई है।
साथ ही मुस्लिम बहुत क्षेत्रों में विशेष रूप से 9वीं से 12वीं कक्षा के लिए, विशेष रूप से लड़कियों के लिए स्कूल खोले जाने की सिफारिश की गई है, ताकि लड़कियों की स्कूली शिक्षा में भागीदारी को बढ़ाया जा सके। वहीं, 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध कराए जाने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
पांचवां दावा: “भारत का शिक्षा मंत्रालय मुसलमानों के मदरसा की डिग्री को IAS- IPS-PCS और जज़ बनने के लिए भी मान्यता दे!”
यह दावा भी भ्रामक और आधा-अधूरा है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मदरसों के आधुनिकीकरण पर जोर देते हुए कहा कि उन्हें सामान्य स्कूल के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि पूरक के तौर पर देखा जाना चाहिए।

साथ ही मदरसों को उच्च माध्यमिक स्कूल बोर्ड से जोड़े जाने की व्यवस्था की जानी चाहिए, ताकि मदरसा में पढ़ने वाले छात्र मदरसा से पास होकर मुख्य धारा की शिक्षा में आ सकें। इसके अलावा सिविल सेवा, बैंक, रक्षा सेवाएं और अन्य ऐसी परीक्षाओं जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में पात्रता के लिए मदरसों से प्राप्त डिग्रियों को मान्यता दी जानी चाहिए।
छठा दावा: “भारत मे 30% सांसदों की सीट और हर एक राज्य में 40% विधायकों की सीट्स, मुसलमानों के लिए रिजर्व किया जाए!”
सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में संसद में 30% और विधानसभाओं में 40% सीटें मुसलमानों के लिए आरक्षित करने की सिफारिश करने का दावा फेक और तथ्यात्मक रूप से गलत है।

हालांकि, रिपोर्ट में मुस्लिमों के कम राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर चर्चा करते हुए उनकी भागीदारी सुधारने के लिए कई उपाय सुझाए गए हैं और इनमें निर्वाचन क्षेत्रों के अधिक तर्कसंगत परिसीमन का सुझाव शामिल है, ताकि मुस्लिम-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों को अनुसूचित जाति (SCs) के लिए आरक्षित न कर दिया जाए, जिससे मुसलमानों का प्रतिनिधित्व सीमित होता है।
सातवां दावा: “भारत की हर एक राज्य सरकार बोर्ड निगम और सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी बढ़ा के 50% करें!”
यह दावा भी गलत है।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, “सरकारी नौकरी और दूसरे कार्यक्रम में मुसलमानों की हिस्सेदारी के विस्तृत विश्लेषण से पता चला है कि दोनों में उनकी हिस्सेदारी बहुत कम है। हालांकि, किसी तरह के भेदभाव का आरोप नहीं लगाया जा रहा है, लेकिन यह अच्छा होगा कि कम्युनिटी से एक्सपर्ट्स को संबंधित इंटरव्यू पैनल और बोर्ड में शामिल किया जाए। यह तरीका अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के मामले में पहले से ही चलन में है।”
आठवां दावा: “मुसलमानों को व्यापार करने के लिए हर एक राज्य मे अलग-अलग इंड्रस्ट्रियल जोन हो और उसे वहा कर्ज मुक्त लोन के साथ, मुफ्त बिजली और मुफ्त जमीन मिले!”
यह दावा भी गलत है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में मुसलमानों के लिए विशेष औद्योगिक क्षेत्र (सेज) बनाने या मुफ्त बिजली, मुफ्त जमीन और बिना कर्ज वाले लोन देने की सिफारिश नहीं की है।
हालांकि, समिति ने पब्लिक प्रोग्राम के तहत कवरेज को और ज्यादा स्कीमों तक बढ़ाए जाने और इसमें NABARD और SIDBI से मिलने वाले लोन को भी शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही SIDBI को अपने एंटरप्रेन्योरियल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत माइनॉरिटीज़ की ट्रेनिंग के लिए एक फंड अलग रखने की सलाह दी गई है।
समिति की रिपोर्ट में नाबार्ड (NABARD) की माइक्रो-क्रेडिट स्कीम में माइनॉरिटीज की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए एक पॉलिसी बनाने की सलाह दी गई है, जिसमें यह बताया जाना चाहिए कि NABARD को माइक्रो-क्रेडिट में मुसलमानों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए गांव में मुसलमानों की आबादी के प्रतिशत के आधार पर टारगेट और इंसेंटिव स्कीम के मिक्स के जरिए क्या दखल देना होगा।
नौंवा दावा:”मुस्लिम लड़कियों की शादी के लिए केंद्र सरकार 5 लाख रुपये और राज्य सरकार 5 लाख रुपये की मदद करें, और मुस्लिम लड़कों के स्वयं-रोजगार के लिए 10 लाख रुपये सरकार अनुदान करे!”
यह दावा भी फेक है। सच्चर समिति ने अपनी रिपोर्ट में मुस्लिम महिलाओं की शादी के लिए 5 लाख रुपये या मुस्लिम लड़कों को अपना कारोबार शुरू करने के लिए 10 लाख रुपये देने की सलाह नहीं दी है।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में हालांकि ऐसे कई लक्षित कार्यक्रमों की सलाह दी है, ताकि मुस्लिमों को वित्तीय समावेशन के दायरे में लाया जा सके और कर्ज तक उनकी आसान पहुंच सुनिश्चित की जा सके।
10वां दावा: “जिस भी गांव, क़स्बा, शहर या जिला मे मुस्लिम आबादी 25% से ज्यादा हो, उसे सिर्फ मुसलमानो के चुनाव लड़ने के लिए रिजर्व कर दिया जाय!”
समिति ने किसी भी क्षेत्र को केवल मुसलमानों के लिए आरक्षित करने की सिफारिश नहीं की है, बल्कि उसने मौजूदा परिसीमन प्रणाली (जो मुस्लिम-बहुल सीटों को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित करती है) में सुधार की मांग करती है, ताकि मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व का उचित अवसर मिल सके।
यानी रिपोर्ट में मुस्लिमों के बेहतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बारे में बात की गई है, न कि उनके लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की।
वायरल दावे को लेकर हमने राष्ट्रीय एकता परिषद के पूर्व सदस्य और ऑल इंडिया मुस्लिम मस्जिद मुशावरत के पूर्व अध्यक्ष नवेद हामिद से संपर्क किया। उन्होंने बताया, “सच्चर समिति की सिफारिशें अल्पसंख्यकों के सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक सशक्तिकरण को लेकर थी। इसमें मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की नहीं बल्कि परिसीमन के जरिए उनके बेहतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सुझाव दिया गया था। इसके साथ ही उनके शैक्षणिक उत्थान के लिए भी कई सुझाव दिए गए थे। हालांकि मुस्लिमों की बेहतरी के लिए जो बातें होती हैं, उसे जानबूझकर गलत तरीके से सोशल मीडिया पर शेयर किया जाता है।”
निष्कर्ष: मुस्लिमों के लिए संसद और विधानसभा में सीटों की संख्या आरक्षित करने और उनके एक मत को दो के बराबर गिने जाने का दावा फेक है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार में (2005 में) गठित सच्चर समिति ने अपनी रिपोर्ट में ऐसी कोई सिफारिश नहीं की थी। साथ ही वायरल पोस्ट में इस समिति की रिपोर्ट के हवाले से शेयर किया जा रहा अन्य दावा भी भ्रामक और निराधार है, जिसमें तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है।
- Claim Review : सच्चर समिति ने अपनी सिफारिश में कहा था कि मुसलमान 1 वोट डालेगा तो उसकी गिनती 2 वोट के बराबर होगी!
- Claimed By : Tipline User
- Fact Check : झूठ
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