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Explainer: कितना बड़ा है परमाणु हथियारों का वैश्विक जखीरा, जानें क्या होती है न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन?

परमाणु कार्यक्रम को लेकर जारी मौजूदा इजरायल-ईरान संघर्ष के बीच दुनिया में कुल 9 ऐसे देश हैं, जो परमाणु शक्ति संपन्न हैं। एफएएस के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के 9 परमाणु हथियारों से लैस देशों के पास कुल 12,241 परमाणु हथियारों का जखीरा है, जिसमें से 9,600 हथियार सैन्य इस्तेमाल के लिए हैं।

  • By: Abhishek Parashar
  • Published: Jun 27, 2025 at 02:24 PM
  • Updated: Jul 1, 2025 at 02:08 PM

नई दिल्ली (विश्वास न्यूज)। अगस्त 1942 में अमेरिका के मैनहटन प्रोजेक्ट की शुरुआत के बाद से अब दुनिया में परमाणु हथियारों का बड़ा जखीरा मौजूद है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने पहले परमाणु हथियार को बनाने के लिए इस प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी। फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट (FAS) के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया में इस वक्त कुल 12,241 परमाणु हथियार हैं और इनमें से 90 फीसदी हिस्सा हिस्सा अकेले अमेरिका और रूस के पास हैं। 

परमाणु हथियार और उसे बनाए जाने का मुद्दा एक बार फिर से सुर्खियों में हैं और इस मुद्दे की वजह से मध्य पूर्व क्षेत्र में तनाव की स्थिति है। 13 जून को शुरू हुए ऑपरेशन ‘राइजिंग लॉयन’ के बारे में इजरायली डिफेंस फोर्स (IDF) की तरफ से दी गई जानकारी के मुताबिक, आईडीएफ ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को निशाना बनाने और इजरायल के खिलाफ ईरान की जारी आक्रामकता के जवाब में इस सैन्य अभियान की शुरुआत की। यह सैन्य अभियान केवल इजरायल तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें अमेरिका भी कूद पड़ा।

‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ के तहत 21 जून को अमेरिकी बॉम्बर्स विमानों ने व्हाइटमैन एयर फोर्स बेस से उड़ान भरी और करीब 18 घंटे लंबे इस सैन्य अभियान में उन्होंने ईरान के परमाणु संव केंद्रों नतांज, फोर्डो और इस्फाहान को निशाना बनाया। 

इस अभियान की जानकारी देते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बताया, “ईरान के प्रमुख परमाणु संवर्धन केंद्र पूरी तरह से नष्ट कर दिए गए  हैं। मध्य पूर्व को धमकाने वाले ईरान को अब क्षेत्र में शांति स्थापित करनी होगी। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो भविष्य में हमले कहीं अधिक बड़े और आसान होंगे।”

ईरान ने 2015 में परमाणु समझौता किया था, जिसके बाद ईरान ने प्रतिबंधों से राहत के बदले में अपने परमाणु कार्यक्रम के अधिकांश हिस्से को समाप्त करने तथा अपने संयंत्रों को अधिक व्यापक अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के लिए खोलने पर सहमति व्यक्त की थी। 

व्हाइटहाउस आर्काइव के आंकड़ों के मुताबिक, “ईरान के पास 8-10 परमाणु बम बनाने के लिए यूरेनियम का भंडार है और इस परमाणु समौझते की वजह से से ईरान को अपने यूरेनियम भंडार को 98% तक खत्म करना होगा और यूरेनियम संवर्द्धन को 3.67% के स्तर पर रखना होगा, जो बम बनाने के लिए जरूरी संवर्द्धन के स्तर से काफी कम है।”

हालांकि, 2018 में अमेरिका इस संधि से अलग हो गया था। तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कहते हुए इस संधि से अमेरिका को अलग कर लिया था कि यह संधि ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को काबू करने में नाकाम रही है।

दुनिया के परमाणु शक्ति संपन्न देश

परमाणु कार्यक्रम को लेकर जारी मौजूदा इजरायल-ईरान संघर्ष के बीच दुनिया में कुल 9 ऐसे देश हैं, जो परमाणु शक्ति संपन्न हैं। एफएएस के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के 9 परमाणु हथियारों से लैस देशों के पास कुल 12,241 परमाणु हथियारों का जखीरा है, जिसमें से 9,600 हथियार सैन्य इस्तेमाल के लिए हैं।

एफएएस के आंकड़ों के अनुसार, इन 9,600 हथियारों में से करीब 3,900 को बैलिस्टिक मिसाइल और बॉम्बर्स बेस में तैनात किया गया है। वहीं, करीब 2,100 परमाणु हथियारों से लैस बैलिस्टिक मिसाइल को बेहद कम समय में लॉन्च किया जा सकता है। दुनिया के कुल परमाणु हथियारों के जखीरे में 90 फीसदी हिस्सा अकेले अमेरिका (कुल 3,700) और रूस (4,309) के पास हैं।

हालांकि, पिछले कई वर्षों से दुनिया के परमाणु हथियारों के जखीरे में लगातार कमी आई है। 2025 की स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के परमाणु हथियारों के जखीरे में गिरावट आई है और इसकी वजह अमेरिका और रूस के सैन्य इस्तेमाल से हटाए जा चुके परमाणु हथियारों को नष्ट करना है।

क्या होती है न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन?

यह शब्द 2024 में व्यापक चर्चा का केंद्र रहा, जब यूक्रेन से युद्ध के बीच रूस ने अपनी आधिकारिक न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन को अपडेट किया था। SIPRI की रिपोर्ट के मुताबिक, इस अपडेट का मकसद परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की संभावनाओं को व्यापक करना था।

न्यूक्लिर डॉक्ट्रिन वह सिद्धांत होता है, जो परमाणु शक्ति संपन्न देशों के परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की स्थिति को बतााता है।  भारत ने 18 मई 1974 को राजस्थान के पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण किया था। इसके बाद मई 1998 में परीक्षण किया गया।

भारत के साथ पाकिस्तान ने भी 1998 में परमाणु परीक्षण किया। चार जनवरी 2003 को प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से जारी दस्तावेज में भारत ने अपने न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन के विवरण को जारी किया।

भारत के न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन के मुख्य रूप से तीन स्तम्भ हैं:

1. क्रेडिबल मिनिमम डिटरेंस (न्यूनतम और विश्वसनीय  प्रतिरोध)

इसका मतलब है कि किसी देश के पास इतनी परमाणु क्षमता होनी चाहिए कि वह अपने संभावित दुश्मन को हमला करने से रोक सके। यानी किसी देश के पास परमाणु हथियार होने चाहिए जो हमला होने की स्थिति में जवाबी कार्रवाई करने में सक्षम हों।

2. नो फर्स्ट यूज (पहले इस्तेमाल नहीं)

यह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि भारत परमाणु हमले के जवाब में ही अपने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करेगा।

3. गैर परमाणु शक्ति संपन्न देशों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं

भारत उन देशों के खिलाफ परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेगा, जो परमाणु हथियार से संपन्न नहीं हैं।

इस डॉक्ट्रिन में इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि अगर भारत के खिलाफ या भारतीय सेना के खिलाफ कहीं भी कोई जैविक या रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया जाता है, तो भारत जवाबी कार्रवाई में परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के विकल्प को आजमा सकता है। 

क्या होती है न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी?

इस दस्तावेज के मुताबिक, परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने के बारे में निर्णय लेने वाली संस्था न्यूक्लियर  कमांड अथॉरिटी है। यह अथॉरिटी राजनीतिक परिषद (पॉलिटिकल काउंसिल) और कार्यकारी परिषद (एग्जीक्यूटिव  काउंसिल) से मिलकर बनी होती है। 

राजनीतिक परिषद की अध्यक्षता जहां प्रधानमंत्री के पास होती है, वहीं कार्यकारी परिषद की अध्यक्षता राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार करते हैं। कार्यकारी परिषद का मुख्य काम, राजनीतिक परिषद के लिए गए फैसलों को तामील करना होता है।

दूसरों के परमाणु हथियारों को रखने वाले देश

दुनिया में कुल नौ देश हैं, जिनके पास परमाणु हथियार हैं। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और इजरायल। इनमें से पांच देश अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस और रूस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं, जिन्हें पी5 के नाम से जाना जाता है और इन्हें वीटो की शक्ति हासिल है।

पी5 और उसकी वीटो शक्ति के बारे में समझने के लिए देखें एक्सप्लेनर आर्टिकल:

हालांकि, दुनिया में इनके अलावा कुछ अन्य देश भी हैं, जिनके पास खुद का परमाणु हथियार तो नहीं है, लेकिन वे इन देशों के परमाणु हथियारों का ठिकाना हैं। ICAN के आंकड़ों के मुताबिक, तुर्किये  के पास कुल 20 अमेरिकी परमाणु हथियार हैं। वहीं, इटली  के पास 35 अमेरिकी परमाणु हथियार, बेल्जियम, जर्मनी, नीदरलैंड के पास अमेरिकी परमाणु हथियार हैं। बेलारूस के पास रूसी परमाणु हथियार हैं।

गौरतलब है कि इनमें से किसी भी देश ने ट्रीटी ऑन द प्रोहिबिशन ऑफ न्यूक्लियर वीपंस (TPNW)  पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। 

परमाणु अप्रसार से जुड़ी संधियां

अमूमन इन दोनों संधियों को लेकर भ्रम की स्थिति रहती है। एक जुलाई 1968 को परमाणु अप्रसार संधि (NPT) अस्तित्व में आया, वहीं TPNW, 2017 में अस्तित्व में आया।

1.NPT नौ परमाणु-सशस्त्र देशों में से पांच चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका को अपने परमाणु हथियार किसी और को हस्तांतरित करने या अन्य राष्ट्रों को परमाणु हथियार प्राप्त करने में सहायता करने से रोकता है।

2.यह संधि अन्य सभी पक्षों को परमाणु हथियार बनाने या उसे हासिल करने से रोकता है।

3. यह संधि अंतरराष्ट्रीय  सुरक्षा निगरानी के तहत परमाणु ऊर्जा के “शांतिपूर्ण उद्देश्यों” को प्रोत्साहित करता है।

भारत, इजरायल और पाकिस्तान इस संधि में शामिल नहीं है और उत्तर कोरिया ने 2003 में खुद को इस संधि से अलग कर लिया था।

वहीं ट्रीटी ऑन द प्रोहिबिशन ऑफ न्यूक्लियर वीपन्स (TPNW)

1.टीपीएनडब्ल्यू परमाणु हथियारों से संबंधित गतिविधियों की एक विस्तृत शृंखला  को प्रतिबंधित करता है।

2. यह परमाणु हथियारों के भंडार को खत्म करने के लिए स्पष्ट रूपरेखा स्थापित करता है।

3. यह वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों के उपयोग और परीक्षण से होने वाले नुकसान को रोकने की दिशा में काम करता है।

बेहद सामान्य तौर पर समझें तो जहां एनपीटी इसमें शामिल होने वाले सभी देशों के लिए परमाणु हथियारों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाता है और न ही परमाणु निरस्त्रीकरण कैसे और कब होना चाहिए, के बारे में स्पष्ट रूप से बताता है, वहीं TPNW पूरी तरह से परमाणु हथियारों के खात्मे की वकालत करता है। ICAN के मुताबिक, इस संधि को 50 देश अनुमोदित कर चुके हैं। हालांकि, दुनिया के 9 परमाणु शक्ति संपन्न देशों ने इस संधि का विरोध किया है।

सीटीबीटी

परमाणु अप्रसार से जुड़ी एक और संधि है, जिसे सीटीबीटी (द कॉम्प्रिहेंसिव न्यूक्लियर टेस्ट बैन ट्रीटी) के नाम से जाना जाता है। 1996 में यह संधि अस्तित्व में आया था और SIPRI की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में पापुआ न्यू गिनी के इस संधि को अनुमोदित किए जाने के बाद इसे मंजूरी और अनुमोदित करने वाले देशों की संख्या 178 हो चुकी है।

सीटीबीटी वास्तव में एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जो सभी प्रकार के परमाणु परीक्षणों को प्रतिबंधित करती है। बताते चलें कि अमेरिका ने इस संधि पर हस्ताक्षर तो किया है, लेकिन इसे अनुमोदित नहीं किया है। वहीं भारत ने भी न तो इस संधि पर हस्ताक्षर किया है और न ही इसे अनुमोदित किया है।

बिजनेस और अर्थव्यवस्था से जुड़े अन्य मामलों की विस्तृत जानकारी प्रदान करती एक्सप्लेनर रिपोर्ट को विश्वास न्यूज के एक्सप्लेनर सेक्शन में पढ़ा जा सकता है।

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