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Explainer:  ईरान-इजरायल, रूस-यूक्रेन और भारत-पाकिस्तान, सैन्य खर्च पर क्या कहते हैं आकड़ें?

2024 में पूरी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सशस्त्र संघर्ष की स्थिति देखने को मिली और इस वजह से वैश्विक तौर पर सैन्य खर्च में इजाफा भी हुआ। दुनिया के कुल सैन्य खर्च में जहां अकेले अमेरिका और चीन की हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी रही, वहीं दुनिया के 15 शीर्ष सैन्य खर्च करने वाले देशों की कुल वैश्विक सैन्य खर्च में 80 फीसदी की हिस्सेदारी रही। क्षेत्र आधारित ट्रेंड्स को देखें तो SIPRI की रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 के मुकाबले 2024 यूरोप (17%), मध्य पूर्व (15%) और एशिया व ओशेनिया (6.3%) क्षेत्र में सैन्य खर्च में सर्वाधिक वृद्धि देखने को मिली।

  • By: Abhishek Parashar
  • Published: Jun 21, 2025 at 02:19 PM
  • Updated: Jun 21, 2025 at 03:10 PM

नई दिल्ली (विश्वास न्यूज)। फरवरी 2022 में शुरू हुआ रूस-यूक्रेन युद्ध अभी तक थमा नहीं है और दुनिया के सामने एक नए युद्ध का खतरा मंडराने लगा है। 13 जून को शुरू हुए ऑपरेशन ‘राइजिंग लॉयन’ के बाद इजरायल और ईरान के बीच स्थिति गंभीर होती जा रही है। इजरायली डिफेंस फोर्स (IDF) की तरफ से दी गई जानकारी के मुताबिक, आईडीएफ ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को निशाना बनाने और इजरायल के खिलाफ ईरान की जारी आक्रामकता के जवाब में इस सैन्य अभियान की शुरुआत की। इजरायल के इस हमले के जवाब में ईरान ने भी जवाबी पलटवार किया है और दोनों देश एक दूसरे के ठिकानों को निशाना बना रहे हैं।

इजरायल और फिलीस्तीन संघर्ष के बाद मध्य पूर्व में यह दूसरा बड़ा संकट है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है। डीडब्ल्यू की रिपोर्ट के मुताबिक, “इजरायल और ईरान के बीच का संघर्ष पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी में धकेल सकता है। ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को नियंत्रित करता है और उसने इसे बंद करने की धमकी दी है।”

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण परिवहन मार्गों में से एक हैं। यूएस एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (ईआईए) की रिपोर्ट के मुताबिक, “दुनिया की तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है।” रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल और ईरान के मौजूदा संघर्ष के बाद से तेल की कीमतों में करीब तीन फीसदी तक का उछाल देखने को मिला है।

इससे कुछ दिनों पहले दक्षिण एशिया में भी ऐसी स्थिति देखने को मिली थी। ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ के तहत भारत के पाकिस्तान और उसके कब्जे वाली कश्मीर (पीओके) में आतंकी शिविरों को निशाना बनाए जाने के बाद पाकिस्तान के उकसावे की कार्रवाई करते हुए भारत के सैन्य और असैन्य ठिकानों को निशाना बनाना शुरू किया था, जिसके बाद दोनों देशों के बीच गंभीर तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी। 

जब किसी क्षेत्र में देशों के बीच भू-राजनीतिक तनाव की स्थिति पैदा होती है, तो उसका सीध असर देशों की अर्थव्यवस्था पर देखने को मिलता है और उनकी खर्च की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जारी भू-राजनीतिक तनाव की वजह से 2024 में वैश्विक सैन्य खर्च में व्यापक इजाफा देखने को मिला और यह बढ़कर 2718 अरब डॉलर हो गया।

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के आंकड़ों के मुताबिक, यह 9.4 फीसदी की भारी-भरकम वृद्धि है 1988 के बाद से सर्वाधिक सालाना बढ़ोतरी है। अगर विश्व अर्थव्यवस्था के संदर्भ में देखें तो 2024 में कुल वैश्विक अर्थव्यवस्था यानी कुल वैश्विक जीडीपी का 2.5 फीसदी हिस्सा सैन्य क्षमता पर खर्च हुआ। 

इतना ही नहीं लगातार दूसरे साल दुनिया के सभी पांच भौगोलिक क्षेत्रों में सैन्य खर्च में वृद्धि हुई , जो दुनिया में बढ़ते भूराजनीतिक तनाव को दर्शाता है।

रूस-यूक्रेन युद्ध – यूरोप के सैन्य खर्च में बेतहाशा वृद्धि!

2024 में रूस के यूक्रेन पर हमला किए जाने के बाद से यूरोपीय क्षेत्र के सैन्य खर्च में व्यापक इजाफा हुआ है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के मुताबिक यूरोप का सैन्य खर्च 2024 में 17% बढ़कर 693 अरब डॉलर हो गया, जो 2015 के मुकाबले 83 फीसदी अधिक है। SIPRI के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में माल्टा को छोड़कर सभी यूरोपीय देशों के सैन्य खर्च में वृद्धि हुई है। 

रूस-यूक्रेन के बीच जारी युद्ध की वजह से 2024 में यूक्रेन का कुल सैन्य खर्च 2.9 फीसदी बढ़कर 64.7 अरब डॉलर रहा। अगर इसे जीडीपी यानी यूक्रेन की कुल अर्थव्यवस्था के मुकाबले देखें तो स्थिति ज्यादा साफ नजर आती है। 2024 में यूक्रेन का सैन्य खर्च उसकी कुल जीडीपी का 34 फीसदी रहा।

हालांकि, यह 2023 के 37 फीसदी के मुकाबले कम है, लेकिन इसके बावजूद यूक्रेन दुनिया का इकलौता ऐसा देश है, जिसका सैन्य खर्च उसकी कुल जीडीपी के मुकाबले दहाई अंकों में हैं, जबकि दुनिया के शीर्ष सैन्य खर्च वाले देशों में जीडीपी के मुकाबले उनके सैन्य खर्च की हिस्सेदारी 10 फीसदी से काफी नीचे है।

रूस का इसी वर्ष सैन्य खर्च (अनुमानित) 149 अरब डॉलर रहा, जो उसकी जीडीपी का 7.1 फीसदी हिस्सा है। यह 2023 के मुकाबले सालाना आधार पर 38% अधिक है। गौरतलब है कि रूस जहां 2024 में सर्वाधिक सैन्य खर्च करने वाले शीर्ष पांच देशों में शुमार रहा, वहीं यूक्रेन शीर्ष 10 में आठवें पायदान पर शामिल रहा।

इजरायल-ईरान, इजरायल-फिलीस्तीन संघर्ष, मध्य-पूर्व में भी सैन्य खर्च में इजाफा

मध्य पूर्व में सऊदी अरब सर्वाधिक सैन्य खर्च करने वाला देश है। वैश्विक तौर पर यह सातवां बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश है। मध्य-पूर्व का यह क्षेत्र पहले इजरायल-फिलीस्तीन संघर्ष का गवाह रहा और अब इस क्षेत्र में एक और संघर्ष व्यापक रूप लेता दिख रहा है। 2024 में मध्य पूर्व क्षेत्र का कुल सैन्य खर्च 243 अरब डॉलर रहा, जो 2023 के मुकाबले सालाना आधार पर 15 फीसदी अधिक है। इस क्षेत्र में सबसे अधिक सैन्य खर्च करने वाला देश सऊदी अरब है।

‘ऑपरेशन राइजिंग लॉयन’ के बाद इजरायल और ईरान के बीच तनाव और संघर्ष की स्थिति गंभीर होती जा रही है। दोनों संघर्ष में इजरायल के शामिल होने की वजह से 2024 में उसके सैन्य खर्च में 65 फीसदी का इजाफा देखने को मिला और यह बढ़कर 46.5 अरब डॉलर हो गया। 

जीडीपी में % हिस्सेदारी के आधार पर देखें तो 2023 में इजरायल की जीडीपी में उसके रक्षा खर्च की हिस्सेदारी 5.4% रही, जो 2024 में बढ़कर 8.8 फीसदी हो गई। यूक्रेन के बाद इजरायल दूसरा सर्वाधिक खर्च करने वाला देश है।

वहीं, 2023 के मुकाबले 2024 में ईरान का रक्षा खर्च कम रहा। SIPRI के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में इरान का रक्षा खर्च करीब 8 अरब डॉलर रहा, जो उसकी जीडीपी का 2% है। SIPRI की रिपोर्ट के मुताबिक, रक्षा खर्च में आई कमी की वजह अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से महंगाई में इजाफा होना है। अमेरिकी प्रतिबंधों का असर ईरान के तेल निर्यात पर पड़ा है, जो ईरान के निर्यात राजस्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 

एशिया में रक्षा खर्च: भारत-पाकिस्तान संघर्ष

एशिया और ओशेनिया क्षेत्र में 2024 में कुल रक्षा खर्च 629 अरब डॉलर रहा, जो 2023 के मुकाबले 6.3 फीसदी अधिक है। 2024 में सालाना वृद्धि के लिहाज से देखें तो विशेषकर पूर्वी एशिया में सैन्य खर्च में 2024 में 7.8 फीसदी का इजाफा हुआ और यह बढ़कर 433 अरब डॉलर हो गया। उत्तर कोरिया से बढ़ते खतरे को देखते हुए दक्षिण कोरिया ने रक्षा खर्च में वृद्धि की, वहीं ताइवान ने भी अपने रक्षा खर्च में करीब दो फीसदी का इजाफा किया। 

चीन के साथ बढ़ते तनाव के बीच ताइवान लगातार अमेरिका से हथियार खरीद रहा है। 

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद दक्षिण एशिया तनाव का केंद्र बिंदु रहा। भारत की पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई के बाद अब सीजफायर की वजह से तनाव में कमी आई है। हालांकि, पिछले कई वर्षों से भारत ने अपने रक्षा खर्च में इजाफा किया है।

SIPRI के 2024 के सैन्य खर्च के आंकड़ों के मुताबिक,  2024 में भारत का कुल सैन्य खर्च 86.1 अरब डॉलर रहा है, जो 2023 के मुकाबले 1.6 फीसदी अधिक है। अगर जीडीपी में हिस्सेदारी के लिहाज से देखें तो 2024 में भारत के रक्षा खर्च की उसकी जीडीपी में हिस्सेदारी 2.3 फीसदी रही। 

वैश्विक तौर पर सैन्य खर्च के मामले में भारत चौथा बड़ा देश है। वहीं पाकिस्तान का 2024 में सैन्य खर्च 10.2 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 5 फीसदी कम है। जीडीपी के मुकाबले अगर देखें तो 2024 में पाकिस्तान की जीडीपी में सैन्य खर्च की हिस्सेदारी 2.7 फीसदी रही।

2025-26 के केंद्रीय बजट में रक्षा मंत्रालय को 6,81,210.27 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया, जो पिछले वर्ष के बजटीय अनुमान के मुकाबले 9.5 फीसदी अधिक है। 

क्या है वैश्विक ट्रेंड्स?

2024 में पूरी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सशस्त्र संघर्ष की स्थिति देखने को मिली और इस वजह से वैश्विक तौर पर सैन्य खर्च में इजाफा भी हुआ। दुनिया के कुल सैन्य खर्च में जहां अकेले अमेरिका और चीन की हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी रही, वहीं दुनिया के 15 शीर्ष सैन्य खर्च करने वाले देशों की कुल वैश्विक सैन्य खर्च में 80 फीसदी की हिस्सेदारी रही।

2024 में अमेरिका ने कुल 997 अरब डॉलर सैन्य खर्च किया, वहीं दूसरे नंबर पर 314 अरब डॉलर के साथ चीन दूसरे नंबर पर रहा। तीसरे नंबर पर रूस (अनुमानित 149 अरब डॉलर), चौथे पर जर्मनी (88.5 अरब डॉलर) और पांचवें पायदान पर भारत (86 ) रहा।

क्षेत्र आधारित ट्रेंड्स को देखें तो SIPRI की रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 के मुकाबले 2024 यूरोप (17%), मध्य पूर्व (15%) और एशिया व ओशेनिया (6.3%) क्षेत्र में सैन्य खर्च में सर्वाधिक वृद्धि देखने को मिली।

फ्रीका क्षेत्र में जिबूती, इरीट्रिया और सोमालिया के आंकड़ें शामिल नहीं हैं। वहीं अमेरिकी क्षेत्र में क्यूबा के आंकड़ें, एशिया और ओशेनिया क्षेत्र में उत्तर कोरिया, लाओस, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान के आंकड़ें शामिल नहीं हैं। मध्य पूर्व के आंकड़ों में सीरिया और यमन के आंकड़ें शामिल नहीं हैं।

2024 सर्वाधिक सैन्य बोझ वाले देश यूक्रेन (34%), इजरायल  (8.8%) और अल्जीरिया (8.0%) थे। सैन्य बोझ को मापने का तरीका देश की कुल जीडीपी में सैन्य खर्च की हिस्सेदारी से है।

बिजनेस और अर्थव्यवस्था से जुड़े अन्य मामलों की विस्तृत जानकारी प्रदान करती एक्सप्लेनर रिपोर्ट को विश्वास न्यूज के एक्सप्लेनर सेक्शन में पढ़ा जा सकता है।

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