Explainer: विश्व बैंक कैसे तय करता है गरीबी रेखा और क्या होता है गिनी इंडेक्स?
विश्व बैंक का आंकड़ा तीन आधार पर गरीबी का आकलन करता है। पहला आधार 2.15 डॉलर प्रतिदिन पर गुजर बसर करने का है, जो अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा है। वहीं, निम्न मध्य आय वर्ग गरीबी रेखा (LMIC) रोजाना 3.65 डॉलर प्रतिदिन के आधार पर निर्धारित है। तीसरा तरीका, मल्टी डायमेंशनल गरीबी रेखा (MPI) है, जो 2022-23 में भारत के लिए 15.5 फीसदी है।
- By: Abhishek Parashar
- Published: Jul 15, 2025 at 05:24 PM
- Updated: Jul 16, 2025 at 12:17 PM
नई दिल्ली (विश्वास न्यूज)। हाल ही में सामने आए विश्व बैंक (WB) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में न केवल गरीबी में कमी आई है, बल्कि देश में आर्थिक असमानता भी कमी आई है। विश्व बैंक की अप्रैल की “Poverty & Equity Brief” रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का गिनी इंडेक्स 25.5 रहा, जो इसे दुनिया का चौथा “सर्वाधिक समतामूलक” देश बनाता है।
प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) ने इस रिपोर्ट को भारत में घटती ‘असमानता’ और ‘गरीबी’ को सरकार की उपलब्धि बताया। इन आंकड़ों के आधार पर पीआईबी की तरफ से जारी विज्ञप्ति के मुताबिक, जिन तीन देशों का गिनी इंडेक्स भारत से ऊपर है, उनमें स्लोवाक रिपब्लिक, स्लोवेनिया और बेलारूस शामिल है। 2011-12 में जहां भारत का गिनी इंडेक्स 28.8 था, वह 2022-23 में घटकर 25.5 फीसदी हो गया। खपत आधारित गिनी इंडेक्स में कम स्कोर का मतलब आर्थिक असमानता में कमी को दर्शाता है।
विश्व बैंक के इन आंकड़ों के सामने आने के बाद यह विवाद का मुद्दा बन गया। न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने जहां इन आंकड़ों को अपनी उपलब्धि बताया, वहीं विपक्ष ने इन आंकड़ों को लेकर सरकार पर निशाना साधा। कांग्रेस ने विश्व बैंक की रिपोर्ट के अन्य पहलुओं का जिक्र किया, जिसका जिक्र भारत सरकार की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति में नहीं है।
भारत के खपत आधारित गिनी इंडेक्स में हुए सुधार के साथ विश्व बैंक की रिपोर्ट कहती है, “…इसके उलट वैश्विक असमानता डेटाबेस बताता है कि भारत में आय की असमानता बढ़ रही है। 2004 में जहां इस मामले में गिनी इंडेक्स 52 था, वह 2023 में बढ़कर 62 हो गया।” रिपोर्ट में कई अन्य पहलुओं का भी जिक्र है। रिपोर्ट बताती है, “2023-24 में (भारत में) वेतन असमानता की स्थिति उच्च बनी हुई है, जिसमें शीर्ष 10 फीसदी की औसत आय निचले पायदान पर मौजूद 10 फीसदी के मुकाबले 13 गुणा अधिक है।”
तो इस एक्सप्लेनर सीरीज में हम यह समझेंगे कि गिनी इंडेक्स क्या होता है और साथ ही विश्व बैंक के गरीबी को निर्धारित करने के क्या मानक हैं और यह समय के साथ कैसे विकसित होता रहा है।
क्या होता है गिनी इंडेक्स?
गिनी इंडेक्स किसी भी देश में असमानता को मापने का सर्वाधिक प्रचलित तरीका है। इस इंडेक्स को इटली के सांख्यिकीविद कोराडो गिनी ने 1884-1965 के बीच विकसित किया था और फिर उन्हीं के नाम पर इस इंडेक्स का नामकरण किया गया।
विश्व बैंक के मुताबिक, यह इंडेक्स 0 (या 0%) से 100 (या 100%) के स्केल पर असमानता को मापता है। अधिक स्कोर बढ़ती असमानता को बताता है, वहीं न्यूनतम स्कोर घटती असमानता को बताता है। सामान्य तरीके से समझें तो अगर किसी देश का गिनी इंडेक्स 0 है तो इसका मतलब यह है कि उस देश में आर्थिक असमानता न के बराबर है और वहां सबकी आय समान है। वहीं अगर किसी देश का स्कोर 100 है, तो इसका मतलब यह है कि उस देश में सर्वाधिक असमानता है।
100 स्कोर का मतलब है- पूरी आय, संपत्ति या खपत एक व्यक्ति के हाथों में है। गिनी इंडेक्स लॉरेन्ज कर्व और पूर्ण समानता को दर्शाती काल्पनिक रेखा के बीच के क्षेत्र को प्रतिशत में मापता है और इस दौरान 0 रीडिंग का मतलब पूर्ण समानता और 100 का मतलब पूर्ण असमानता की स्थिति होती है।
विश्व बैंक के मुताबिक, भारत का गिनी सूचकांक (खपत आधारित) वर्ष 2011 में 28.8 था, जो वर्ष 2022 में घटकर 25.5 हो गया। इंडेक्स में स्कोर में आई गिरावट भारत में घटती आर्थिक असमानता को बताता है। भारत का गिनी इंडेक्स चीन के (2021 के उपलब्ध आंकड़ों) 35.7, ब्रिटेन के (2021 के उपलब्ध आंकड़ों) 32.4 और अमेरिका (2023 के आंकड़ों) के 41.8 से काफी नीचे है।

इस इंडेक्स के मुताबिक, भारत में जी-7 और जी-20 के देशों के मुकाबले ज्यादा आर्थिक असमानता है। बताते चलें कि जी-7 और जी-20 के देश विश्व बैंक के मुताबिक, विकसित अर्थव्यवस्थाओं की श्रेणी में आते हैं। यानी भारत के गिनी इंडेक्स में सुधार हुआ है, लेकिन वह खपत आधारित गिनी इंडेक्स में हुआ सुधार है।
लेकिन आय वाले गिनी इंडेक्स की बात करें तो विश्व बैंक की रिपोर्ट, इसे लेकर चिंता जताती है। विश्व बैंक के डेटाबेस में अन्य देशों के गिनी इंडेक्स को यहां देखा जा सकता है।
विश्व बैंक की रिपोर्ट में खपत आधारित गिनी इंडेक्स में आई गिरावट के साथ अत्यधिक गरीबी और गरीबी के आंकड़ों को भी जारी किया गया है, जिसके मुताबिक भारत में अत्यधिक गरीबी में भारी गिरावट आई है।
गरीबी में गिरावट पर विश्व बैंक का आंकड़ा!
विश्व बैंक की अप्रैल ‘Spring 2025 Poverty & Equity Briefs’ रिपोर्ट के मुताबिक, “भारत में अत्यधिक गरीबी (रोजाना 2.15 डॉलर से कम पर गुजर बसर करने वाले) 2011-12 के 16.2 फीसदी से घटकर 2022-23 में 2.3 फीसदी हो गई।” और इस तरह भारत की 17 करोड़ की आबादी गरीबी रेखा से ऊपर आ गई।
वहीं (समान आधार पर) ग्रामीण क्षेत्रों में अत्यधिक गरीबी जहां 18.4 फीसदी से कम होकर 2.8 फीसदी हो गई, जबकि शहरों में अत्यधिक गरीबी 10.7 फीसदी से कम होकर 1.1 फीसदी हो गई।

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत विश्व बैंक के वर्गीकरण के मुताबिक, अब निम्न-मध्य वाली अर्थव्यवस्था की श्रेणी में आता है और इस आधार पर अगर 3.65 डॉलर प्रतिदिन (एलएमआईसी गरीबी रेखा) के आधार पर देखें तो भारत में गरीबी 61.8 फीसदी से घटकर 28.1 फीसदी हो गई। वहीं, ग्रामीण गरीबी 69 फीसदी से कम होकर 32.5 फीसदी, जबकि शहरी गरीबी 43.5 फीसदी से कम होकर 17.2 फीसदी हो गई।
विश्व बैंक के गरीबी निर्धारण का तरीका
विश्व बैंक का आंकड़ा तीन आधार पर गरीबी का आकलन करता है। पहला आधार 2.15 डॉलर प्रतिदिन पर गुजर बसर करने का है, जो अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा है। वहीं, निम्न मध्य आय वर्ग गरीबी रेखा (LMIC) रोजाना 3.65 डॉलर प्रतिदिन के आधार पर निर्धारित है। तीसरा तरीका, मल्टी डायमेंशनल गरीबी रेखा (MPI) है, जो 2022-23 में भारत के लिए 15.5 फीसदी है।

बहुआयामी गरीबी को केवल आय के संदर्भ में नहीं मापा जाता है। इसे तय करने के लिए कई अन्य मानकों को ध्यान में रखा जाता है, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, साफ-सफाई और अन्य जरूरी सेवाओं तक पर्याप्त पहुंच शामिल है। बहुआयामी गरीबी को केवल आय के संदर्भ में नहीं मापा जाता है। इसे तयक रने के लिए कई अन्य मानकों को ध्यान में रखा जाता है, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, साफ-सफाई और अन्य जरूरी सेवाओं तक पर्याप्त पहुंच शामिल है।
इसका आकलन बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) के आधार पर किया जाता है और रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में यह गरीबी 2005-06 के 53.8 फीसदी से कम होकर 2019-21 में 16.4 फीसदी हो गई। वहीं विश्व बैंक का बहुआयामी गरीबी 2022-23 में 15.5 फीसदी रहा।
बताते चलें कि विश्व बैंक ने भारत में अत्यधिक गरीबी निर्धारण के लिए 2011-12 के खपत खर्च सर्वे (CES) और 2022-23 के घरेलू खपत सर्वे के आंकड़ों का इस्तेमाल किया है।
वैश्विक गरीबी रेखा निर्धारण का विकास
विश्व बैंक के गरीबी रेखा के निर्धारण को तरीकों को समझने से पहला विश्व बैंक के अर्थव्यवस्थाओं के वर्गीकरण के तरीकों को समझना जरूरी है। विश्व बैंक ने 2016 में अपने वर्गीकरण मानकों में बदलाव करते हुए देशों को ‘विकसित’ और ‘विकासशील’ देशों के तौर पर चिह्नित करने की बजाए जीएनआई (ग्रॉस नेशनल इनकम) प्रति व्यक्ति के आधार पर करने का फैसला लिया था और इस आधार पर दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को चार श्रेणी में रखा गया है।
1. उच्च आय वाली अर्थव्यवस्थाएं
2. ऊच्च मध्य आय वाली अर्थव्यवस्थाएं
3. निम्न मध्य वाली अर्थव्यवस्थाएं
4. निम्न आय वाली अर्थव्यवस्थाएं

विश्व बैंक के मुताबिक, निम्न आय वाली अर्थव्यवस्था में अत्यधिक गरीबी को निर्धारित करने की सीमा प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 3 डॉलर की है और हालिया आंकड़ों के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर 10 में से एक व्यक्ति अत्यधिक गरीबी में जी रहा है और इनमें से अधिकांश संख्या सब-सहारा अफ्रीका और संघर्ष से प्रभावित क्षेत्रों की है।
वहीं, निम्न मध्य आय वाली अर्थव्यवस्था (लोअर मिडल इनकम इकोनॉमिज) में गरीबी रेखा प्रति व्यक्ति प्रति दिन 4.20 डॉलर प्रतिदिन है और ऊच्च मध्य आय वाली अर्थव्यवस्था में यह सीमा रेखा 8.30 डॉलर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन है। इस आधार पर दुनिया में प्रत्येक पांच में से एक व्यक्ति आज के समय में 4.20 डॉलर प्रतिदिन के नीचे गुजर बसर कर रहा है, जबकि दुनिया की करीब आधी आबादी रोजाना 8.30 प्रतिदिन से नीचे गुजर बसर कर रही है।
अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा को सबसे पहले 1990 में पेश किया गया था। विश्व बैंक के मुताबिक,1990 में निम्न आय वाले देशों में वैश्विक तौर पर प्रत्येक 10 में से 9 व्यक्ति अत्यधिक गरीबी में रह रहा था। हालांकि, उसके बाद से वैश्विक डेमोग्राफी में काफी बदलाव आया है और अब दुनिया की कुल आबादी का तीन-चौथाई हिस्सा मध्य आय देशों में रह रही है।

मध्य आय वाले देशों में गरीबी का बेहतर आकलन करने के लिए विश्व बैंक ने 2017 में दो अतिरिक्त वैश्विक गरीबी रेखा की शुरुआत की, जिनमें से एक निम्न मध्य वाले देशों के लिए, जबकि दूसरा उच्च मध्य आय वाले देशों के लिए था। विश्व बैंक समय के साथ लगातार इन मानकों को संशोधित करता रहा है। वहीं, वैश्विक गरीबी को मापने के लिए विश्व बैंक पीपीपी (परचेजिंग पावर पैरिटी) का इस्तेमाल करता है।
विश्व बैंक के गरीबी और असमानता प्लेटफॉर्म पर 2017 और 2021 के पीपीपी आधार पर अन्य देशों और क्षेत्रों के गरीबी और अन्य इंडिकेटर्स को देखा जा सकता है।
भारत में गरीबी रेखा का निर्धारण
गरीबी को निर्धारित करने का सबसे प्रचलित तरीका न्यूनतम खर्च (या आय) है, जिसकी मदद से कोई व्यक्ति अपनी बुनियादी मानवीय जरूरतों को पूरा करने के लिए वस्तुओं या सेवाओं की खरीदारी कर सकता है। यही न्यूनतम खर्च गरीबी रेखा है।
नीति आयोग की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, अधिकांश देश और वैश्विक संस्थाएं (विश्व बैंक या संयुक्त राष्ट्र) इसी तरीके से गरीबों की गिनती करते हैं। भारत में पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर आधिकारिक ग्रामीण और शहरी गरीबी रेखा निर्धारण की शुरुआत 1979 में वाई के अलघ समिति ने की थी और इसी के आधार पर पहली बार गरीबों की गिनती की गई।
पीआरएस इंडिया पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, अलघ समिति ने पोषण संबंधी जरूरतों के आधार पर गरीबी रेखा का निर्धारण किया। समिति ने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 2400 किलो कैलोरी और शहरी क्षेत्रों के लिए 2100 किलो कैलोरी की आवश्यकता निर्धारित की थी और इन कैलोरी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जरूरी प्रति व्यक्ति उपभोग खर्च गरीबी रेखा के रूप में निर्धारित किया गया।

इसके बाद 1993 में डीटी लकड़वाला समिति का गठन किया और 2011 तक आधिकारिक गरीबी रेखा इसी समिति की सिफारिशों पर आधारित थी। अरविंद पनगढ़िया और मेघा मुकीम की भारत में गरीबी की एनालिसिस रिपोर्ट के मुताबिक, डीटी लकड़वाला समिति ने 1973-74 की बाजार कीमतों पर प्रति व्यक्ति खपत खर्च के आधार पर अखिल भारतीय ग्रामीण और शहरी गरीबी रेखा को निर्धारित किया।
2004-05 तक यह भारत की आधिकारिक गरीबी रेखा निर्धारण नीति रही। इसके बाद गरीबी अनुमान में जरूरी बदलाव करने के लिए योजना आयोग (अब नीति आयोग) ने सुरेश तेंदुलकर समिति की अध्यक्षता में तेंदुलकर समिति का गठन किया और इस समिति ने 2009 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसके बाद से भारत में गरीबी रेखा का निर्धारण तेंदुलकर समिति के फॉर्मूले के आधार पर किया जाता रहा है।
गरीबी रेखा को लेकर विवाद!
अरविंद पनगढ़िया और मेघा मुकीम की स्टडी रिपोर्ट में भारत में गरीबी रेखा निर्धारण को लेकर हुए सितंबर 2011 और मार्च 2012 में हुए दो दौर के विवादों का जिक्र है। पहले दौर का विवाद उस वक्त सामने आया, जब योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर बताया कि भारत में गरीबी रेखा के लिए निर्धारण की सीमा शहरी क्षेत्र में 32 रुपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन , जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के लिए यह सीमा प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 26 रुपये है।
तेंदुलकर समिति के फॉर्मूले पर आधारित यह सीमा रेखा लकड़वाला समिति के आधार पर निर्धारित रेखा से अधिक थी, जिसके आधार पर 2004-05 तक आधिकारिक रूप से गरीबी का निर्धारण किया जाता रहा था।
एक बार फिर से यह विवाद मार्च 2012 में सामने आया, जब योजना आयोग ने 2009-10 के खर्च सर्वेक्षण के आधार पर देश में गरीबी के अनुमान के आंकड़ों को जारी किया। योजना आयोग ने बताया कि ये अनुमान शहरी क्षेत्र में 28.26 रुपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन और ग्रामीण क्षेत्र में 22.2 रुपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के आंकड़ों पर आधारित है।
रंगराजन समिति
2012 में गरीबी का अनुमान लगाने के लिए रंगराजन समिति का गठन किया था, जिसने अपनी रिपोर्ट 30 जून 2014 को सौंपी। सात अगस्त 2014 को राज्यसभा में लिखित सवाल का जवाब देते हुए तत्कालीन राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने कहा कि इस समिति की रिपोर्ट के मुताबिक गरीबी रेखा का निर्धारण मासिक प्रति व्यक्ति खर्च के आधार पर होगा, जो शहरी क्षेत्र के लिए 1407 रुपये और ग्रामीण क्षेत्र के लिए 972 रुपये है।
हालांकि, सरकार ने अभी तक रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू नहीं किया है। यानी सरकार ने गरीबी रेखा निर्धारण पर रंगराजन समिति की रिपोर्ट को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है और देश में भी इसके निर्धारण के लिए तेंदुलकर समिति के फॉर्मूले का इस्तेमाल किया जा रहा है।
क्या कहते हैं अर्थशास्त्री?
वरिष्ठ अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने कहा कि गरीबी को तय करने का आधार “सोशल मिनिमम नेसेसरी कन्जम्प्शन ” (यानी न्यूनतम सामाजिक अनिवार्य खपत) होता है और यह समय और स्थान सापेक्षिक होता है। इसलिए, “गरीबी रेखा को निर्धारित किए जाने का तरीका या फॉर्मूला पुराना नहीं हो सकता है।” दूसरा, विश्व बैंक के गरीबी रेखा का फॉर्मूला पीपीपी आधारित है, जो भारत के संदर्भ में वास्तविक तस्वीर को पेश नहीं करता है।

भारत के संदर्भ में इन आंकड़ों और गिनी इंडेक्स पर उन्होंने कहा, “गिनी इंडेक्स के आंकड़े आय और खपत के आधार पर है और यह आंकड़ा भारत सरकार के (इनकम टैक्स रिटर्न) डेटा पर आधारित है और उपलब्ध आंकड़ें बताते हैं कि भारत में कुल आबादी का बेहद छोटा प्रतिशत इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करता है और उसमें भी एक बड़ा हिस्सा शून्य रिटर्न फाइल करने वाले करदाताओं का है।”
ईटी की 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, इस संबंध में पूछे गए सवाल का राज्यसभा को लिखित जवाब देते हुए सरकार ने बताया, “वित्त वर्ष 2023-24 में कुल 6.68 प्रतिशत लोगों ने इनकम टैक्स रिटर्न फाइल किया।” यानी वित्त वर्ष 2023-24 में कुल 8,09,03,315 लोगों ने इनकम टैक्स फाइल किया और इसमें से AY 2023-24 में 4.90 करोड़ लोगों ने शून्य टैक्स आईटीआर फाइल किया।
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