Fact Check: सावरकर, वाजपेयी, मोदी, विवेकानंद, हेडगेवार और करपात्री महाराज को लेकर वायरल हो रहे पोस्ट में सच और झूठ का घालमेल

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नई दिल्ली (विश्वास टीम)। सोशल मीडया पर एक पोस्ट वायरल हो रहा है, जिसमें कई बयानों का हवाला देते हुए दावा किया जा रहा है कि 2019 से पहले की गई राजनीतिक ”भविष्यवाणियां” अब सच होती दिख रही हैं। इन दावों की सत्यता को परखने के लिए हमें कई शोध, किताबें और वरिष्ठ रिसर्चर्स के अलावा कई अलग-अलग स्रोतों की मदद लेनी पड़ी।

हमारी जांच में राजनीतिक भविष्यवाणियों के रूप में वायरल हो रहे सात बयानों में दो सही साबित हुए, हालांकि यह बयान अपने संदर्भ में किसी भविष्यवाणी के रूप में नहीं दिए गए थे। वहीं पांच बयान ऐसे निकले, जिन्हें भ्रामक दावे के साथ पेश किया गया था।

पड़ताल

सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे इस पोस्ट में सात दावों का जिक्र भविष्यवाणियों के तौर पर किया गया है। विश्वास न्यूज ने सभी दावों की स्वतंत्र तरीके से पड़ताल की।

पहली भविष्यवाणी

1. एक दिन आएगा जब वोट के लिए कांग्रेसी नेता कोट पर जनेऊ पहनेंगे। -वीर सावरकर, 1959*

Fact Check- सावरकर से जुड़े शोध और अध्ययन के मामले में विशेषज्ञता रखने वाले सच्चिदानंद शेवड़े ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि यह सावरकर का बेहद चर्चित बयान हैं। हालांकि, उन्होंने इस बयान की तिथि और जगह के बारे में कोई जानकारी नहीं दी।

इन संकेतों के बाद बयान का संदर्भ, तिथि और जगह के बारे में जानकारी जुटाने के लिए हमने महाराष्ट्र के सावरकर स्मारक से संपर्क किया। स्मारक के अध्यक्ष रंजीत सावरकर (सावरकर के पड़पोते) ने बयान की सत्यता की पुष्टि करते हुए विश्वास न्यूज को बताया कि सावरकर का यह बयान 10 जुलाई 1943 का है, जब उन्होंने अविभाजित हिंदुस्तान के सिंध प्रांत में मुस्लिम लीग के साथ हिंदू महासभा के संयुक्त मंत्रिमंडल का गठन किए जाने पर कांग्रेस के ”दुष्प्रचार” का जवाब देते हुए पत्रक निकाला था।

समग्र सावरकर वॉल्यूम 8 (ऐतिहासिक निवेदन) में पृष्ठ संख्या 485-489 पर उनके इस पत्रक को पढ़ा जा सकता है। संयुक्त मंत्रिमंडल के गठन के बाद कांग्रेस ने हिंदू महासभा पर हिंदू विरोधी पार्टी होने का आरोप लगाते हुए उसे ”पाकिस्तानानुकूल” कहना शुरू कर दिया था।


समग्र सावरकर वॉल्यूम 8 (ऐतिहासिक निवेदन)

इसी के जवाब में उन्होंने लिखा, ‘परंतु यह टिप्पणी मन: पूर्वक की जाती तो मुझे प्रसन्नता होती। क्योंकि हिंदुओं पर यदि अत्यंत घिनौना, हीन आरोप करना हो तो वह ‘पाकिस्तानानुकूल’ और लीग को अथवा ‘मुसलमानों’ को संतुष्ट करने के लिए हिंदू हित का घात करनेवाला यह है, यह बात सीखने के लिए मैंने कांग्रेसवादी हिंदुओं को अंत में बाध्य किया। जैसा मैं बार-बार कहता था, उनके अनुसार कांग्रेसवादी हिंदुओं को केवल शरीर पर नहीं, कोट पर जनेऊ पहनकर हिंदू संघटनी सिद्धांतों का प्रचार करना पड़ा! परंतु इन नेताओं के नेता बंदीशाला से मुक्त होने पर हिंदुस्थान के बंटवारे के करारनामे पर हस्ताक्षर करने के लिए और कांग्रेस की आधी-अधूरी राष्ट्रीयता की वेदी पर हिंदू हित की बलि चढ़ाने जब लीग के शिविर में जाएंगे तब ये लोग उनका आदर-सत्कार कैसे करेंगे-यह विचार मेरे मन में आने पर उन लोगों पर दया आती है। (चार वर्षों के पश्चात जून 1947 में ऐसा ही घटा।)’

निष्कर्ष- प्रचारित बयान सही है, लेकिन 1943 में दिया गया यह बयान तत्कालीन राजनीतिक संदर्भ में था।

दूसरी भविष्यवाणी

2.  एक दिन पूरे देश पर भाजपा का राज होगा।-अटल जी 1999, संसद में

Fact Check- 1999 में लोकसभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। 17 अप्रैल 1999 को प्रस्ताव पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी सरकार का पक्ष रखा था। हालांकि, इस पूरी बहस में उन्होंने यह कभी नहीं कहा, ‘एक दिन पूरे देश पर भाजपा का राज होगा।’ उनके भाषण को यहां सुना जा सकता है।

हालांकि मुंबई में हुए बीजेपी के अधिवेशन में सभा को संबोधित करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था, ”भारत के पश्चिमी घाट को मंडित करने वाले महासागर के किनारे खड़े होकर मैं यह भविष्यवाणी करने का साहस करता हूं कि अंधेरा छंटेगा….सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा।”

”इंडिया टीवी” के ”आप की अदालत” कार्यक्रम में वाजपेयी ने पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए कहा, ‘अगर वह इसी तरह से बेखबर रहे और यथार्थ का सामना करने के लिए तैयार नहीं हुए, तो धीरे-धीरे कांग्रेस की पूरी पूंजी लुट जाएगी और वह खाली हाथ रह जाएंगे।’

9.03 मिनट से 9.18 तक उनके इस बयान को सुना जा सकता है।

निष्कर्ष- पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में यह नहीं कहा कि पूरे देश में भाजपा का राज होगा। हालांकि, उन्होंने संकेतात्मक भाषा में वर्ष 1980 के मुंबई अधिवेशन में ”कमल खिलने” की भविष्यवाणी जरूरी की थी और इसके बाद एक इंटरव्यू में भी उन्होंने कहा था कि अगर कांग्रेस यथार्थ का सामना करने को तैयार नहीं हुई, तो उसकी पूरी पूंजी लुट जाएगी।

तीसरी भविष्यवाणी

3.    मैं भारत को कांग्रेस मुक्त करके रहूंगा।   -नरेंद्र मोदी 2010

Fact Check- 12 जनवरी 2014 को गोवा में हुई ”विजय संकल्प” रैली में नरेंद्र मोदी ने इस नारे का जिक्र करते हुए इसका मतलब बताया था। तब नरेंद्र मोदी ने कहा था, ‘देश की जनता ने कांग्रेस पार्टी को सदा सर्वदा से निकालने का मन बना लिया है। कांग्रेस मुक्त भारत, यह भाजपा का नारा नहीं है, यह जन-जन का संकल्प है।’

12 जनवरी 2014 को यू-ट्यूब पर अपलोड किए गए वीडियो में 9.53 मिनट से 12.12 मिनट तक पर उन्हें ”कांग्रेस मुक्त भारत” का जिक्र करते हुए सुना जा सकता है। मोदी ने कहा, ‘जब मैं कहता हूं कांग्रेस मुक्त भारत, कांग्रेस नाम का एक संगठन नहीं सिर्फ, कांग्रेस पार्टी के सिर्फ नेता नहीं, कांग्रेस एक कल्चर बन गया है। कांग्रेस एक विकृत व्यवस्था बन गई है। हिंदुस्तान के रगों में 60 साल में भिन्न भिन्न रूप में, भिन्न भिन्न दलों के रूप में, भिन्न-भिन्न नेताओं के माध्यम से वह विकृतियां भारत के रगों में फैल चुकी है। कांग्रेस मुक्त भारत की बात जब मैं करता हूं, तब भारत को उन बीमारियों से मुक्त करना है, उन रोगों से मुक्त करना है। परिवारवाद की बीमारी हो, जातिवाद की बीमारी हो, संप्रदायवाद की बीमारी हो, प्रादेशिकवाद की बीमारी हो, ऊंच-नीच की बीमारी हो, संप्रदायवाद का जहर हो….गरीबी हो, बीमारी हो, बेरोजगारी हो, ये सारे बीमारियों से मुक्ति। इसी का मतलब है कांग्रेस मुक्त भारत। यह कोई संस्था के लिए नहीं है। यह बीमारियों की जड़ें कांग्रेस के नाम से जानी जाती है।’

इसके बाद 2017 में संसद के बजट सत्र के छठे दिन राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलते हुए लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा उन्होंने नहीं दिया है, बल्कि ये राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का सपना था और महात्मा गांधी जी को श्रद्धांजलि के तौर पर यह काम करना ही करना है। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी बहुत पहले समझ गए थे इसलिए मैं इसे बस पूरा कर रहा हूं।’

न्यूज एजेंसी एएनआई को 2019 में दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि कांग्रेस मुक्त नारे का मतलब पार्टी को खत्म कर देने का नहीं था। मोदी ने कहा कि उनका आशय उस मानसिकता से है जो कांग्रेस की संस्कृति दर्शाती है, जैसे कि वंशवाद, जातिगत भावना, परिवारवाद, इत्यादि। उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस को एक मजबूत विपक्ष के रूप में उभरना है तो उसे भी ‘कांग्रेस-मुक्त’ होना होगा।

खुद नरेंद्र मोदी के अनुसार तीनों ही मौकों पर उन्होंने बतौर पार्टी ”कांग्रेस मुक्त भारत” का जिक्र नहीं किया।

निष्कर्ष- नरेंद्र मोदी का ”कांग्रेस मुक्त” भारत का बयान किसी पार्टी विशेष से भारत को मुक्त करने का नहीं था, बल्कि उनके अनुसार उन ”बुराईयों” से था, जिसका ”प्रतिनिधित्व” कांग्रेस करती है, और इसे लेकर उन्होंने संसद में भी अपनी बात रखी।

चौथी भविष्यवाणी

4. मैं आज कांग्रेस छोड रहा हूं, पर मैं शपथ लेता हूं कि मैं इसी कांग्रेसी विचारधारा के विरुद्ध ऐसा संगठन खडा करूंगा जो इसका नामोनिशान मिटाकर रख देगा। चाहे इसके लिये 100 साल क्यों न लगें। 800 साल की गुलामी में 100 साल और सही, पर यही संगठन भारत को फिर अखंड भारत बनाकर रहेगा।

– केशव बलिराम हेडगेवार, संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक, 1922, नागपुर

Fact Check- संघ की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, ‘वह एक अनोखा सामाजिक संगठन है, जो भारत के पुनरुत्थान और वैश्विक शांति के लिए समर्पित है।’ आरएसएस की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक संघ की स्थापना डॉ. केशवराम बलिराम हेडगेवार ने 1925 में की।

”द आरएसएस एंड द बीजेपी: ए डिविजन ऑफ लेबर” के मुताबिक दशहरा के मौके पर नागपुर में 1925 के सितंबर महीने में आरएसएस की स्थापना डॉ. केशवराम बलिराम हेडगेवार ने की, जो पेशे से डॉक्टर थे। वरिष्ठ रिसर्चर सच्चिदानंद शेवड़े ने बताया कि संघ की स्थापना से पहले तक हेडगेवार कांग्रेस से जुड़े हुए थे और उनका मकसद सामाजिक संगठन के निर्माण का था, न कि किसी राजनीतिक संगठन की स्थापना का।

उन्होंने कहा, ”यह पूरी तरह से मनगढ़त बयान है, क्योंकि संघ का निर्माण सामाजिक संगठन के तौर पर किया गया न कि राजनीतिक संगठन के तौर पर। उन्होंने कहा, ‘अगर उन्हें (हेडगेवार) कांग्रेस (जैसे राजनीतिक दल) से निपटने की जरूरत होती तो वह पहले से मौजूद हिंदू महासभा में शामिल हो जाते या फिर किसी राजनीतिक पार्टी का निर्माण करते।’

वायरल बयान में ”अखंड भारत” का भी जिक्र किया गया है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के आधिकारिक मीडिया केंद्र ”विश्व संवाद केंद्र” की वेबसाइट पर हमें संघ के प्रचारक और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इन्द्रेश कुमार का लेख मिला, जिसके मुताबिक, ”सन 1947 में विशाल भारतवर्ष का पिछले 2500 वर्षों में 24वां विभाजन हुआ।” इसी लेख में ”अखंड भारत” का एक नक्शा भी लगा हुआ है, जिसे यहां देखा जा सकता है।

Image Credit-विश्वस संवाद केंद्र

विचारधारा के आधार पर संघ अपने स्वयंसेवकों को किसी भी दल विशेष में शामिल होने पर प्रतिबंध नहीं लगाता है। 25 नवंबर 2017 को प्रकाशित (भाषा) की खबर के मुताबिक, ”राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी कृष्ण गोपाल ने कहा कि आरएसएस कार्यकर्ता कांग्रेस सहित किसी भी राजनीतिक दल में शामिल होने के लिए आजाद हैं, लेकिन विपक्षी पार्टी ही उन्हें नहीं अपनाती।”

निष्कर्ष- संघ के मुताबिक वह राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक संगठन है, जिसकी पुष्टि संघ मामलों के वरिष्ठ रिसर्चर सच्चिदानंद शेवड़े भी करते हैं। उनके मुताबिक हेडगेवार का यह ”बयान” संघ की स्थापना के उद्देश्यों के ही विपरीत है। उनके मुताबिक संघ की स्थापना का मकसद सामाजिक संगठन के निर्माण का था, न कि किसी राजनीति संगठन के निर्माण का।

पांचवीं भविष्यवाणी

5.  अगर मैं प्रधानमंत्री बना तो सबसे पहले काले धन और आतंकवाद को समाप्त करने के लिए 500 और 1000 के नोट अचानक बंद कर दूंगा।- नरेंद्र मोदी, 2007 गुजरात में,

मोदी सरकार 500 और 1,000 के नोट अचानक बंद की।

Fact Check- गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने कभी ऐसा नहीं कहा कि अगर वह प्रधानमंत्री बने तो सबसे पहले काला धन और आतंकवाद को समाप्त करने के लिए 500 और 1,000 रुपये के नोटों को बंद कर देंगे।

2012 में लगातार तीसरी बार जीत दर्ज करने के बाद जब नरेंद्र मोदी एक सभा को संबोधित कर रहे थे, तब भीड़ ने ‘’पीएम-पीएम’’ के नारे लगाने शुरू कर दिए। इसके जवाब में मोदी ने कहा, ‘आपकी अगर इच्छा है तो मैं जरूर 27 तारीख को एक दिन के लिए दिल्ली हो आउंगा।’

20 दिसंबर 2012 को देश गुजरात के यूट्यूब पर अपलोड किए गए वीडियो में 39 मिनट 12 सेकेंड के बाद नरेंद्र मोदी को यह करते हुए सुना जा सकता है। यह पहला भाषण था, जिसमें पहली बार दिल्ली का जिक्र आया था। हालांकि, पूरे भाषण में भी उन्होंने कभी भी खुद के प्रधानमंत्री बनने संबंधी कोई बयान नहीं दिया।

इसके बाद हमने नोटबंदी के दावे की सत्यता की पड़ताल की। सर्च में हमें रेडिफ डॉट कॉम पर अर्थक्रांति संस्थान के चेयरपर्सन अनिल बोकिल का इंटरव्यू मिला, जिसके मुताबिक बोकिल ने वर्ष 2000 में नोटबंदी का सुझाव दिया था। बोकिल के मुताबिक उन्होंने इस इस बारे में सबसे पहले मराठी समाचार पत्र सकाल में लिखा था।

10 नवंबर 2016 को रेडिफ डॉट कॉम के सैय्यद फिरदौस अशरफ से बातचीत में बोकिल ने बताया कि नरेंद्र मोदी से उन्होंने नोटबंदी को लेकर 2013 में मुलाकात की। बैठक के बाद बोकिल चार बार मोदी से मिले और उन्होंने काले धन पर नियंत्रण के तरीकों को लेकर बातचीत की।

उन्होंने बताया कि 2002 में बीजेपी नेता नितिन गडकरी से इसे लेकर मुलाकात हुई, और वह काफी प्रभावित हुए। इसके बाद 2007 में उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी के घर पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया, जिसमें अरुण शौरी और अरुण जेटली मौजूद थे। लेकिन मोदी से इस विचार को लेकर उनकी पहली मुलाकात नवंबर 2013 में हुई, जब उन्हें पार्टी ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया।

सर्च में हमें 22 नवंबर 2016 को प्रकाशित एक और इंटरव्यू का लिंक मिला। इकॉनमिक टाइम्स पर प्रकाशित इस इंटरव्यू में बोकिल ने नोटबंदी की पहल का श्रेय लेते हुए सरकार के तरीकों पर निराशा जताई। उन्होंने कहा, ‘यह वैसा नहीं है, जैसा हमने सुझाया था। सरकार ने हमारे पांच बिंदुओं वाली योजना में से केवल एक हिस्से को लागू किया। हमने बड़े नोटों से छोटे नोटों की व्यवस्था तक जाने के लिए पूरी योजना का खाका दिया था।’

नोटबंदी के बाद इकॉनमिक टाइम्स में प्रकाशित बोकिल का इंटरव्यू

गौरतलब है कि 8 नवंबर 2016 को राष्ट्र के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की घोषणा करते हुए 500 और 1,000 रुपये के नोटों को बैन कर दिया था।

निष्कर्ष- अर्थक्रांति संस्थान के चेयरपर्सन अनिल बोकिल के मुताबिक नरेंद्र मोदी से उनकी मुलाकात 2013 में हुई थी, जिसमें उन्होंने नोटबंदी का सुझाव दिया था। बोकिल के इस बयान का कोई खंडन नहीं मौजूद है, जिसमें उन्होंने नोटबंदी के ”विचार” का श्रेय लिया था।
जबकि कथित दावे के मुताबिक, मोदी ने वर्ष 2007 में नोटबंदी करने का एलान किया था। सार्वजनिक रूप से नरेंद्र मोदी का यह बयान भी उपलब्ध नहीं है, जिसके मुताबिक 2007 में उन्होंने कहा था कि अगर मैं प्रधानमंत्री बना तो सबसे पहले नोटबंदी कर दूंगा।
हालांकि, यह दावा सही है कि नोटबंदी का फैसला अचानक ही लिया गया, जब 8 नवंबर 2016 को राष्ट्र के नाम संबोधन करते हुए मोदी ने 500 और 1000 रुपये के नोटों को तत्काल प्रभाव से बंद करने का एलान किया था।

छठी भविष्यवाणी

6. जिस दिन मरा हुआ हिंदुत्व गर्व से कहेगा कि मैं हिंदू हूं , उस दिन अमेरिका भी भारत की परंपराओं के सामने नतमस्तक होगा और कहेगा कि फलां देश को समझाओ।  -स्वामी विवेकानन्द, 1893, शिकागो, अमेरिका में।

(सनद रहे:-  दो दिन पहले UN ने भारत से कहा है कि उत्तर कोरिया का इलाज सिर्फ भारत कर सकता है, अमेरिका नहीं)

Fact Check- दोनों बयान गलत हैं। 15 सितंबर 1893 को अमेरिका के शिकागो के धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद के भाषण को यहां सुना जा सकता है।

इस भाषण में उन्होंने कहीं भी ऐसा कुछ जिक्र नहीं किया, जिसका दावा वायरल पोस्ट में किया जा रहा है। भाषण के शुरुआत में उन्होंने कहा था, ‘अमेरिका के बहनों और भाइयों, आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है और मैं आपको दुनिया की प्राचीनतम संत परम्परा की तरफ से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं और सभी जातियों, संप्रदायों के लाखों, करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं। अपने पूरे भाषण में उन्होंने कहीं भी राजनीतिक भू-स्थैतिकी को लेकर कोई बयान नहीं दिया।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने उत्तर कोरिया के हालात को लेकर आखिरी प्रस्ताव 10 अप्रैल 2019 को जारी किया है, जिसे यहां देखा जा सकता है। इस प्रस्ताव में उत्तर कोरिया की स्थिति को लेकर भारत का जिक्र नहीं किया है।

निष्कर्ष-विवेकानंद ने शिकागो में हुए धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म और उसकी विशेषताओं को लेकर अपनी बात रखी थी। उन्होंने भारत और अमेरिका की राजनीतिक स्थिति को लेकर कोई टीका टिप्पणी नहीं की थी। न हीं, संयुक्त राष्ट्र ने उत्तर कोरिया के मामले में भारत की किसी भूमिका का आह्वान किया है।

सातवीं भविष्यवाणी

7.  आज गौहत्याबंदी आंदोलन में संसद के सामने इंदिरा गांधी ने एक घंटे में 400 साधुओं को गोली चलाकर मार डाला। मैं कांग्रेस पार्टी को श्राप देता हूं कि एक दिन हिमालय में तपश्चर्या कर रहा एक साधू आधुनिक वेशभूषा मे इसी संसद पर कब्जा करेगा और कांग्रेसी विचारधारा को नष्ट कर देगा। यह एक ब्राह्मण का श्राप है और ब्राह्मण का श्राप कभी खाली नहीं जाता।

    -करपात्री महाराज, संसद के सामने रोते और साधुओं की लाशें उठाते हुए, 1966

Fact Check- द टेलीग्राफ के ऑनलाइन संस्करण में 3 जून 2011 को प्रकाशित बाइलाइन रिपोर्ट के मुताबिक तत्कालीन गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने लेखक को बताया, ‘जब मैं (7 नवंबर 1966) को दोपहर में संसद गया, तो मैं उत्तरी दरवाजे पर गया, जहां प्रदर्शन हो रहा था। इससे पहले मैंने धुंआ उठते हुए देखा था। मुझे बताया गया कि यह आंसू गैसे के गोलों का नतीजा थे। इसके बाद मैं दफ्तर आया और मुझे खबर मिली कि तोड़-फोड़ और गोलीबारी हुई है और कुछ लोगों की मौत हुई है।’

वहीं ”द कॉरवां” ने यूएनआई की रिपोर्ट के हवाले से बताया कि 7 नवंबर 1966 की घटना में संसद भवन के दो मील के दायरे में 250 से अधिक निजी गाड़ियों और दोपहिया वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया। वहीं पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक करीब 830 लोगों को हिरासत में लिया गया था, जिसमें अधिकांश साधु थे। गिरफ्तार लोगों में रामेश्वारनंद (तत्कालीन जनसंघ सांसद) भी शामिल थे।

रिपोर्ट के मुताबिक तत्कालीन गृह राज्य मंत्री जयसुख लाल हाथी ने आधिकारिक बयान जारी कर बताया कि गोलीबारी में 40 लोग घायल हुए, जिसमें आठ की मौत हो गई। मृतकों में एक कॉन्स्टेबल भी शामिल था।

अंग्रेजी अखबार ”द हिंदू” के आर्काइव में सुरक्षित आर्टिकल ने आधिकारिक सूत्रों के हवाले से इस हादसे में मरने वालों की संख्या 7 बताई है, जबकि घायल होने वाले लोगों की संख्या 100 बताई है।

अब बात करते हैं करपात्री महाराज के कथित श्राप की। ”स्पीकिंग ट्री” (हिंदी) में प्रकाशित एक लेख में इस घटना का जिक्र है। रिपोर्ट में करपात्री महाराज के एक श्राप का जिक्र किया गया है, जो उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लेकर दिया था। लेकिन इसमें वैसे किसी श्राप का जिक्र नहीं है, जिसका जिक्र वायरल पोस्ट में किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक मासिक पत्रिका ”आर्यावर्त” और ”केसरी” ने इस खबर को छापा था। कुछ दिनों बाद गोरखपुर से छपने वाली मासिक पत्रिका ”कल्याण ” ने ”गौ अंक में एक विशेषांक” प्रकाशित किया था, जिसमें विस्तार सहित यह घटना दी गयी थी। रिपोर्ट के मुताबिक, करपात्री महाराज ने कल्याण के उसी अंक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को संबोधित करते हुए उनके परिवार को लेकर श्राप दिया था, न कि कांग्रेस पार्टी को लेकर।

निष्कर्ष-गौहत्या बंदी की मांग को लेकर वर्ष 1966 में संसद के बाहर साधुओं का प्रदर्शन हुआ था, और उसमें हुई हिंसा के बाद गोलीबारी भी हुई थी, जिसमें रिपोर्ट्स के मुताबिक कॉन्स्टेबल समेत 8 लोग मारे गए थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना के बाद करपात्री महाराज ने श्राप दिया था, जो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के परिवार को लेकर था। विश्वास न्यूज हालांकि स्वतंत्र रूप से इस श्राप के दावे की पुष्टि नहीं करता है।

निष्कर्ष: विश्वास न्यूज की पड़ताल में राजनीतिक भविष्यवाणियों के रूप में वायरल हो रही पोस्ट में वैसी वैसी कई सूचनाएं शामिल हैं, जो सही हैं लेकिन उनके संदर्भ और समय को बदलकर पेश किया गया है। वहीं कुछ दावे गलत या भ्रामक हैं।

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Written BY Abhishek Parashar
  • Claim Review : सच हो गई यह सात भविष्यवाणियां
  • Claimed By : FB User-Sachin Kumar
  • Fact Check : Half true

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