X
X

Fact Check: सांसदों या विधायकों के वकालत करने पर नहीं है कोई रोक, वायरल दावा गलत है

यह दावा गलत है कि संसद के रूप में सरकारी वेतन, भत्ता और पेंशन लेने के बावजूद कोई सांसद, विधायक या विधान पार्षद (MP/MLA/MLC) स्वतंत्र रूप से वकालत नहीं कर सकता है और भारतीय अधिवक्ता अधिनियम, 1961 विधायिका के सदस्यों को स्वतंत्र रूप से वकील के रूप में बहस करने से रोकता है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम 49 के मुताबिक, कोई भी एडवोकेट अगर लॉ प्रैक्टिस या वकालत कर रहा है, तो वह किसी भी व्यक्ति, सरकार, कंपनी या निगम का पूर्णकालिक वेतनभोगी कर्मचारी नहीं हो सकता है और सुप्रीम कोर्ट 2018 के अपने फैसले में यह स्पष्ट कर चुका है कि सांसद या विधायक पूर्णकालिक वेतनभोगी कर्मचारी नहीं है, इसलिए वे विधायिका का सदस्य रहते हुए वकालत कर सकते हैं।

  • By: Abhishek Parashar
  • Published: Apr 24, 2025 at 02:29 PM
  • Updated: Apr 24, 2025 at 04:41 PM

नई दिल्ली (विश्वास न्यूज)। संसद से पारित होने के बाद वक्फ (संशोधन) अधिनियम देश में लागू हो चुका है और कई याचिकाओं के माध्यम से इस अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना समेत तीन न्यायाधीश की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रहा है, जिसमें वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है। कई याचिकाओं में से एक याचिका जमीयत उलमा-ए-हिंद के प्रेसिडेंट मौलाना अरशद मदनी की भी है, जिस पर कपिल सिब्बल पक्ष रख रहे हैं।

इसी संदर्भ में सोशल मीडिया यूजर एक पोस्ट को शेयर करते हुए दावा कर रहे हैं कि एक सांसद के रूप में सरकारी वेतन और भत्ता लेने के बावजद कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट में वक्फ अधिनियम के खिलाफ मुस्लिम पक्ष के वकील के रूप में बहस नहीं कर सकते, क्योंकि इंडियन एडवोकेट एक्ट, 1961 का संदर्भ उन्हें ऐसा करने से रोकता है।

विश्वास न्यूज ने अपनी जांच में इस दावे को गलत पाया। इंडियन एडवोकेट्स एक्ट, 1961 भारत के सांसदों या विधायकों को लॉ की प्रैक्टिस करने पर रोक नहीं लगाता है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया रुल्स उन एडवोकेट के लॉ प्रैक्टिस पर रोक लगाता है, जो पूर्णकालिक वेतनभोगी कर्मचारी होते हैं और सुप्रीम कोर्ट यह स्पष्ट कर चुका है कि विधायिका के सदस्य पूर्णकालित वेतनभोगी कर्मचारी नहीं हैं, इसलिए वे विधायिका का सदस्य रहते हुए स्वतंत्र रूप से वकालत कर सकते हैं।

क्या है वायरल?

सोशल मीडिया यूजर ‘डॉ सुधांशु त्रिवेदी अनऑफिसियल ग्रुप’ ने वायरल पोस्ट (आर्काइव लिंक) को शेयर करते हुए लिखा है, “एक सांसद के रूप में सरकारी वेतन,भत्ते और पेंशन लेने के बाबजूद … कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट में वक्फ मामले में मुस्लिम पक्ष के वकील के रूप में बहस कैसे कर सकता है ? इंडियन एडवोकेट एक्ट 1961 का संदर्भ क्यों नहीं लिया जा रहा है ?”

सोशल मीडिया पर फेक दावे के साथ वायरल पोस्ट का स्क्रीनशॉट।

सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर कई अन्य यूजर्स ने इस वीडियो को समान दावे के साथ शेयर किया है।

पड़ताल

वायरल पोस्ट में इंडियन एडवोकेट्स एक्ट, 1961 का जिक्र है और यह एक्ट भारत में लीगल प्रोफेशन को नियंत्रित करता है। इस कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो किसी भी विधायिका के सदस्य (सांसद/विधायक/एमएलसी) को उनके कार्यकाल के दौरान लॉ की प्रैक्टिस करने से रोकता है। यानी वे अपने कार्यकाल के दौरान वकील की भूमिका निभा सकते हैं।

इसी एक्ट का सेक्शन 7 बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) को वकीलों के आचरण संबंधी नियमों को बनाने का अधिकार देता है।

साथ ही यह संस्था वकीलों के अधिकारों, विशेषाधिकारों और उनके हितों की रक्षा भी करते हुए कानूनी सुधारों को प्रोत्साहित करते हुए उसका समर्थन करता है। चूंकि यह एक्ट बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) को वकीलों के आचरण संबंधी नियमों को बनाने का अधिकार देता है। इसलिए हमने बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स को चेक किया।

कई सरकारी वेबसाइट पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स की कॉपी मौजूद है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया की वेबसाइट पर एडवोकेट एक्ट, 1961 और बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स  की कॉपी मौजूद है। इस रूल्स के नियम 49 के मुताबिक, कोई भी एडवोकेट अगर लॉ प्रैक्टिस कर रहा है, तो वह किसी भी व्यक्ति, सरकार, कंपनी या निगम का पूर्णकालिक वेतनभोगी कर्मचारी नहीं हो सकता है।

न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर फैसला देते हुए कहा था कि विधायिका के सदस्यों को  भले ही भारत सरकार के संचित निधि से वेतन और भत्ता मिलता है, लेकिन उन्हें किसी का कर्मचारी नहीं माना जा सकता है।

गौरतलब है कि एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने जनहित याचिका दायर करते हुए हुए विधायिका (संसद या विधानसभा या विधानपरिषद) के सदस्यों को उनके कार्यकाल के दौरान अधिवक्ता या वकील के रूप में लॉ की प्रैक्टिस करने पर रोक लगाए जाने की मांग की थी।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने इस याचिका को खारिज कर दिया था। तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और डॉ. डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा था, “1961 एक्ट और उसके तहत बनाए गए नियमों के प्रावधान विधायिका के सदस्य पर उनके कार्यकाल के दौरान अधिवक्ता के रूप में प्रैक्टिस करने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाते हैं। बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा बनाया गया नियम 49, निर्वाचित जनप्रतिनिधियों पर लागू नहीं होता है, क्योंकि वे किसी व्यक्ति, फर्म, सरकार, निगम या संस्था के पूर्णकालिक वेतनभोगी कर्मचारी की श्रेणी में नहीं आते हैं।”

वायरल पोस्ट में किए गए दावे को लेकर हमने सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ऑन-रिकॉर्ड अश्विनी दुबे से संपर्क किया। उन्होंने कहा कि एडवोकेट एक्ट, 1961 “किसी भी सांसद, विधायक या विधायिका के किसी सदस्य को उसके कार्यकाल के दौरान लॉ की प्रैक्टस करने से नहीं रोकता है।”

बताते चलें कि सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की पीठ वक्फ अधिनियम 1995 को संशोधित करने वाले वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के खिलाफ कई याचिकाओं की सुनवाई कर रहा है, जिसमें इस अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।

बताते चलें कि वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को तीन अप्रैल को लोकसभा और चार अप्रैल को राज्यसभा ने पारित किया था और पांच अप्रैल को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन गया था।

न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक, कपिल सबिल, अभिषेक मनु सिंघवी, राजीव धवन, सी यू सिंह समेत अन्य इस अधिनियम के खिलाफ दायर याचिकाकर्ताओं की तरफ से कोर्ट में पक्ष रख रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सीनियर एडवोकेट कपिल सिबल इस मामले में जमीयत-उलमा-ए-हिंद के प्रेसिडेंट मौलाना अरशद मदनी का पक्ष रख रहे हैं।

निष्कर्ष: यह दावा गलत है कि संसद के रूप में सरकारी वेतन, भत्ता और पेंशन लेने के बावजूद कोई सांसद, विधायक या विधान पार्षद (MP/MLA/MLC) स्वतंत्र रूप से वकालत नहीं कर सकता है और भारतीय अधिवक्ता अधिनियम, 1961 विधायिका के सदस्यों को स्वतंत्र रूप से वकील के रूप में बहस करने से रोकता है।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम 49 के मुताबिक, कोई भी एडवोकेट अगर लॉ प्रैक्टिस या वकालत कर रहा है, तो वह किसी भी व्यक्ति, सरकार, कंपनी या निगम का पूर्णकालिक वेतनभोगी कर्मचारी नहीं हो सकता है और सुप्रीम कोर्ट 2018 के अपने फैसले में यह स्पष्ट कर चुका है कि सांसद या विधायक पूर्णकालिक वेतनभोगी कर्मचारी नहीं है, इसलिए वे विधायिका का सदस्य रहते हुए वकालत कर सकते हैं।

  • Claim Review : सांसदों और विधायकों के वकालत करने पर प्रतिबंध लगाता है इंडियन एडवोकेट एक्ट 1961
  • Claimed By : FB User-डॉ सुधांशु त्रिवेदी अनऑफिसियल ग्रुप
  • Fact Check : झूठ

पूरा सच जानें... किसी सूचना या अफवाह पर संदेह हो तो हमें बताएं

सब को बताएं, सच जानना आपका अधिकार है। अगर आपको ऐसी किसी भी मैसेज या अफवाह पर संदेह है जिसका असर समाज, देश और आप पर हो सकता है तो हमें बताएं। आप हमें नीचे दिए गए किसी भी माध्यम के जरिए जानकारी भेज सकते हैं...

टैग्स

अपनी प्रतिक्रिया दें

No more pages to load

संबंधित लेख

Next pageNext pageNext page

Post saved! You can read it later