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Explainer: भारतीय अर्थव्यवस्था को जलवायु परिवर्तन से नुकसान की आशंका!, दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्था के लिए ‘रेड अलर्ट’

बढ़ते वैश्विक तापमान की वजह से 2050 तक दक्षिण एशियाई उत्पादकता और प्रति व्यक्ति आय में 7 फीसदी तक की कमी आ सकती है। जीडीपी में होने वाली यह अनुमानित गिरावट अन्य ईएमडीई अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले ज्यादा होगी, क्योंकि दक्षिण एशिया में औसत दैनिक तापमान अन्य क्षेत्रों के मुकाबले ज्यादा है और दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्थाएं मुख्य तौर पर कृषि पर टिकी हुई हैं।

नई दिल्ली (विश्वास न्यूज)। उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में दक्षिण एशिया पर्यावरण के लिहाज से सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्र है और लगातार बढ़ता वैश्विक तापमान इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं को अन्य क्षेत्रों की अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है। 

विश्व बैंक की रिपोर्ट ‘From Risk to Resilience: Helping People and Firms Adapt in South Asia’ के मुताबिक, दक्षिण एशिया में कृषि क्षेत्र को बढ़ते वैश्विक तापमान की गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यह क्षेत्र पहले से ही छोटी जोत भूमि और कम उत्पादकता की चुनौतियों का सामना करता रहा है। ऐसे में बढ़ता तापमान, पानी की कमी, अनियमित बारिश और बाढ़ व सूखे की बढ़ती संख्या की वजह से 2050 तक दक्षिण एशिया की कृषि उत्पादन में 7.5 फीसदी कमी आने का अनुमान है, जो अन्य उभरते बाजार और विकासशील आर्थिक क्षेत्रों (ईएमडीई) के मुकाबले कहीं ज्यादा है।

दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाएं मुख्य रूप से अन्य ईएमडीई क्षेत्रों के मुकाबले आय और रोजगार के मामले में कृषि पर ज्यादा निर्भर हैं। इस क्षेत्र की करीब 62 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जो 43 फीसदी वैश्विक औसत के मुकाबले ज्यादा है।

IMF की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक के मुताबिक, 2024 में उभरते बाजार और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की 2024 में समग्र वृद्धि दर 4.3 फीसदी रही और 2025 व 2026 में इनकी वृद्धि दर क्रमश: 3.7 और 3.9 फीसदी रहने का अनुमान है।

रिपोर्ट के मुताबिक,  दक्षिण एशिया में 60 प्रतिशत से अधिक घरों और कंपनियों को पिछले पांच वर्षों में चरम मौसम का सामना करना पड़ा। रिपोर्ट के मुताबिक, 75 फीसदी से अधिक लोगों को अगले दशक में ऐसा ही अनुभव होने की आशंका है।

इस क्षेत्र की सरकारों के पास सीमित संसाधन (राजकोषीय घाटा के संदर्भ में) होने की वजह से जलवायु परिवर्तन की वजह से सामने आने वाली मौसमी चुनौतियों से निपटने का बोझ प्राथमिक तौर पर परिवारों और कंपनियों को ही उठाना पड़ता है। रिपोर्ट बताती है कि कई घर और व्यवसाय पहले से ही जलवायु जोखिमों का सामना करने के लिए बचाव उपाय कर रहे हैं। लगभग 80 प्रतिशत घरों और 63 प्रतिशत कंपनियों ने ऐसे उपाय किए हैं, लेकिन ये बेहद बुनियादी उपाय हैं।

दक्षिए एशिया में बड़ी आबादी के समक्ष भीषण गर्मी और बाढ़ का खतरा

रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले दशक में दक्षिण एशिया में चरम मौसमी घटनाओं की संख्या और उसकी तीव्रता में इजाफा होने की संभावना है। 2030  तक 1.8 अरब लोगों (इस क्षेत्र की 89 फीसदी आबादी) को भीषण गर्मी का सामना करना पड़ सकता है, वहीं करीब 46 करोड़ लोग (22 फीसदी आबादी) को गंभीर बाढ़ का सामना करना पड़ सकता है।

दक्षिण एशिया के कई इलाकों में भीषण गर्मी के खतरे से प्रभावित होने की संभावना पहले से ही अधिक है और आने वाले समय में तापमान के बढ़ने की भी संभावना है। रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण एशिया में 2017-21 के दौरान अधिकतम दैनिक तापमान औसतन 30 डिग्री सेल्सियस रहा, जो अन्य उभरते  बाजार और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं (ईएमडीई) क्षेत्रों के मुकाबले करीब 6 डिग्री अधिक है।

भीषण गर्मी और बढ़ते तापमान के जोखिम का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2021 में बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका समेत दक्षिण एशिया के चार देशों में औसतन छह घंटे प्रतिदिन बाहर काम करना बेहद गर्म था और 2050 तक इसके बढ़कर सात या आठ घंटे प्रतिदिन हो जाने का अनुमान है।

इन गंभीर मौसमी जोखिम से आर्थिक रूप से कमजोर और कृषि पर आधारित परिवार सर्वाधिक गंभीर रूप से प्रभावित होंगे।  रिपोर्ट बताती है कि गंभीर मौसमी जोखिमों की वजह से न केवल मानव पूंजी और संपत्तियों को नुकसान होगा, बल्कि आय का भी नुकसान होगा।

रिपोर्ट बताती है कि प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए जब घरों को पूर्व चेतावनी मिलती है, तो लगभग 90 प्रतिशत लोग नुकसान को कम करने के लिए उपाय करते हैं। लेकिन पूर्व चेतावनी प्रणालियों तक सभी घरों की पहुंच नहीं है। संवेदनशील तटीय और नदी क्षेत्रों में, अधिकांश घरों को चक्रवातों के लिए पूर्व चेतावनी मिल जाती है, लेकिन आधे से भी कम घरों को बाढ़ और अन्य झटकों की पूर्व चेतावनी मिल पाती है।

2010 के बाद से दक्षिण एशिया में हर साल करीब 7 करोड़ लोग प्राकृतिक आपदा से प्रभावित होते हैं, जो दुनिया के किसी भी अन्य क्षेत्रों के मुकाबले बेहद ज्यादा है और आने वाले समय में असामान्य बारिश और बाढ़ की संख्या में इजाफा होने की उम्मीद है।

सुझाव: रिपोर्ट पूर्व चेतावनी सिस्टम को मजबूत और बेहतर करने पर बल देता है।

कृषि और खेती पर बुरा प्रभाव

वैश्विक तापमान में वृद्धि की वजह से दक्षिण एशियाई कृषि को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इस क्षेत्र में पहले से मौजूद बाधाएं इसे और जटिल बना रही हैं, जिसमें छोटी जोत भूमि और कम उत्पादकता शामिल है।

बढ़ते तापमान, पानी की कमी, अनियमित बारिश और चरम मौसमी घटनाओं जैसे सूखा और बाढ़ की बढ़ती  संख्या की वजह से 2050 तक दक्षिण एशिया में कृषि उत्पादन में 7.5 फीसदी गिरावट आने का अनुमान है, जो अन्य उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं (ईएमडीई) के मुकाबले काफी अधिक है।

बढ़ते वैश्विक तापमान से कृषि उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन, श्रमिक आपूर्ति, उत्पादकता और मानवीय पूंजी में गिरावट आने की उम्मीद है और इन सबमें कृषि क्षेत्र के सर्वाधिक प्रभावित होने की आशंका है, जिसमें दक्षिण एशिया की करीब आधी आबादी काम करती है।

रिपोर्ट बताती है कि 2050 तक गंगा का मैदानी क्षेत्र (जो दक्षिण एशिया में सर्वाधिक अन्न उत्पादक क्षेत्र है) गर्म मौसम की वजह से गेहूं की खेती के लायक नहीं रह जाएगा।

सुझाव: जलवायु-स्मार्ट खेती प्रथाओं को बढ़ावा, मौसम बीमा बाजारों का विस्तार, सिंचाई बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण और किसानों को मौसम की जानकारी और सलाहकार सेवाएं देने के लिए डिजिटल तकनीकों का लाभ उठाते हुए कृषि उत्पादकता में आने वाली इस गंभीर गिरावट के खतरे का सामना किया जा सकता है।

प्रतिकूल जलवायु से निपटने में सरकारों की असमर्थता

जलवायु परिवर्तन का खमियाजा न केवल दक्षिण एशियाई ग्रामीण आबादी को प्रभावित करेगा, बल्कि यह शहरी आबादी को भी प्रभावित करेगा। रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक 32 करोड़ लोगों (शहरी आबादी का 24 फीसदी) को बाढ़ के खतरे का सामना करना पड़ सकता है, वहीं 1.2 अरब अरब (शहरी आबादी का 92 फीसदी) को भीषण गर्मी का सामना करना पड़ सकता है।

लगातार बढ़ते वैश्विक तापमान के खतरों को देखते हुए इस क्षेत्र की सरकारें राष्ट्रीय स्तर पर आपदा प्रबंधन के उपायों को लागू कर रही हैं। हालांकि, इस मामले में उनके समक्ष बड़ी बाधा पूंजी की तंगी है। औसतन दक्षिण एशियाई सरकारों का कर्ज (जीडीपी के मुकाबले) और इस क्षेत्र की सरकारों का ब्याज खर्ज (राजस्व के मुकाबले) ईएमडीई क्षेत्रों के मुकाबले कहीं ज्यादा है।

औसतन दक्षिण एशियाई सरकारों का ब्याज खर्ज (राजस्व के मुकाबले) ईएमडीई क्षेत्रों के मुकाबले कहीं ज्यादा है।

बताते चलें कि दक्षिण एशियाई क्षेत्र (एसएआर) में भारत समेत जहां 7 अर्थव्यवस्थाएं हैं, वहीं लैटिन अमेरिका और कैरिबियाई क्षेत्र (एलएसी) में 32 अर्थव्यवस्थाएं, सब सहारा अफ्रीकी क्षेत्र (एसएसए) में 46 अर्थव्यवस्थाएं, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीकी क्षेत्र (एमएनए) में 18 अर्थव्यवस्थाएं और पूर्वी एशिया और प्रशांत (ईएपी) में 21 अर्थव्यवस्थाएं और यूरोप और सेंट्रल एशिया (ईसीए) में 22 अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं।

औसतन दक्षिण एशियाई सरकारों का कर्ज (जीडीपी के मुकाबले) ईएमडीई क्षेत्रों के मुकाबले कहीं ज्यादा है।

दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को गंभीर नुकसान का खतरा!

बढ़ते वैश्विक तापमान की वजह से 2050 तक दक्षिण एशियाई उत्पादकता और प्रति व्यक्ति आय में 7 फीसदी तक की कमी आ सकती है। जीडीपी में होने वाली यह अनुमानित गिरावट अन्य ईएमडीई अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले ज्यादा होगी, क्योंकि दक्षिण एशिया में औसत दैनिक तापमान अन्य क्षेत्रों के मुकाबले ज्यादा है और दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्थाएं मुख्य तौर पर कृषि पर टिकी हुई हैं।

भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि सर्वाधिक संख्या में रोजगार देने वाला क्षेत्र है। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के मुताबिक, कृषि और संबंधित क्षेत्र की देश की जीडीपी में करीब 16 फीसदी हिस्सेदारी है और यह देश की कुल आबादी के करीब 46 फीसदी हिस्से को आजीविका के अवसर मुहैया कराता है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MosPI) की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की जीडीपी में कृषि, वानिकी और मत्स्य क्षेत्र की हिस्सेदारी 18% है।

गौरतलब है कि IMF की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक के मुताबिक, 2024 में उभरते बाजार और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की 2024 में समग्र वृद्धि दर 4.3 फीसदी रही और 2025 व 2026 में इनकी वृद्धि दर क्रमश: 3.7 और 3.9 फीसदी रहने का अनुमान है।

आउटलुक के आधार पर देखें तो उभरती व विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर सर्वाधिक बनी रहने की संभावना है। इस श्रेणी में भारत दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा। आईएमएफ के मुताबिक, वर्ष 2025 और 2026 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर क्रमश: 6.2 और 6.3 फीसदी रहने का अनुमान है, वहीं चीन की वृद्धि दर के क्रमश: 4.0 और 4.0 फीसदी रहने का अनुमान है।

बिजनेस और अर्थव्यवस्था से जुड़े अन्य मामलों की विस्तृत जानकारी प्रदान करती एक्सप्लेनर रिपोर्ट को विश्वास न्यूज के एक्सप्लेनर सेक्शन में पढ़ा जा सकता है।

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